मेले के अंतिम दिन पारंपरिक वाद्ययंत्रों की देवलुओं ने जमकर किया नृत्य
संवाद न्यूज एजेंसी
कोटखाई (राेहड़ू)। ऐतिहासिक शवाल बिशु मेला रविवार को संपन्न हो गया। दो दिवसीय पारंपरिक मेला श्रद्धा, आस्था और धूमधाम के साथ मनाया गया। सदियों पुरानी परंपरा को संजोये यह मेला आज भी क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत और लोक आस्था का प्रतीक बना हुआ है। हर वर्ष माता दुर्गा (नंदराड़ी) पुजैली की पावन पालकी को मेला मैदान तक लाकर मेले का शुभारंभ किया जाता है। माता की पालकी पुजैली मंदिर से पगडंडी रास्तों और विभिन्न गांवों से होते हुए लगभग सात से आठ किलोमीटर की पैदल यात्रा कर शवाल गांव पहुंचती है। इस दौरान श्रद्धालु ढोल-नगाड़ों और पारंपरिक वाद्ययंत्रों के साथ माता का स्वागत करते हैं। मेले के दौरान दिनभर पारंपरिक नाटी और ठहइर नृत्य का दौर चलता रहा। लोगों ने माता की पालकी को नचाकर अपनी आस्था और भक्ति का प्रदर्शन किया। मेले में बड़ी संख्या में स्थानीय लोगों सहित आसपास के क्षेत्रों के लोगों ने भाग लेकर इस ऐतिहासिक आयोजन को यादगार बना दिया।