याचिकाकर्ता ने टावर निर्माण और ट्रांसमिशन लाइन बिछाने से हुए नुकसान के लिए मांगा था मुआवजा
याचिकाकर्ता अपनी जमीन और संपत्ति को हुए नुकसान को साबित करने में विफल रहा
संवाद न्यूज एजेंसी
रामपुर बुशहर। अतिरिक्त जिला न्यायाधीश रोहड़ू की अदालत ने हिमाचल प्रदेश पावर ट्रांसमिशन कॉर्पोरेशन लिमिटेड (एचपीपीटीसीएल) से 21 लाख रुपये मुआवजे की मांग वाली याचिका खारिज कर दी है। जुब्बल निवासी याचिकाकर्ता ने अपनी जमीन पर टावर निर्माण और ट्रांसमिशन लाइन बिछाने से हुए नुकसान के लिए यह मुआवजा मांगा था। अदालत ने पाया कि याचिकाकर्ता अपनी जमीन और संपत्ति को हुए नुकसान को साबित करने में विफल रहा। उसे पहले ही अधिग्रहीत भूमि और कुछ पेड़ों के लिए मुआवजा मिल चुका था। याचिकाकर्ता ने भारतीय टेलीग्राफ अधिनियम, 1885 की धारा-16(3) के तहत यह याचिका दाखिल की थी। उन्होंने दावा किया था कि एचपीपीटीसीएल ने उनकी 00-01-99 हेक्टेयर भूमि पर टावर का निर्माण किया। इस प्रक्रिया में 19 सेब और आठ नाशपाती के पेड़, एक गोशाला और फसलें क्षतिग्रस्त हो गईं। उन्होंने कुल 21 लाख रुपये और 12 फीसदी ब्याज की मांग की गई। एचपीपीटीसीएल ने जवाब में कहा कि याचिकाकर्ता ने पहले ही भूमि बिक्री के लिए 3,64,369 रुपये प्राप्त किए थे। इसके अलावा, 19 सेब और छह नाशपाती के पौधों के नुकसान के लिए 1,40,436 रुपये का मुआवजा भी लिया था। कंपनी ने गोशाला को हुए नुकसान से इन्कार किया। कंपनी ने कहा कि 2013 के टावर स्थान चार्ट में कोई गोशाला दर्ज नहीं थी। अदालत ने पाया कि याचिकाकर्ता अपनी शेष भूमि पर गोशाला और पेड़ों के स्वामित्व को साबित नहीं कर पाया। राजस्व रिकॉर्ड के अनुसार, भूमि घासनी (घास वाली) प्रकृति की थी। पटवारी की रिपोर्ट में भी कई विसंगतियां पाईं गईं। रिपोर्ट बिना लिखित आदेश और एचपीपीटीसीएल को सूचना दिए तैयार की गई थी। मूल्यांकन रिपोर्ट भी राजस्व अधिकारियों या प्रतिवादियों की उपस्थिति के बिना बनाई गई थी। याचिकाकर्ता के गवाहों ने क्षतिग्रस्त पेड़ों की संख्या के संबंध में विरोधाभासी बयान दिए। वहीं, सर्वोच्च न्यायालय के एक फैसले का हवाला देते हुए अदालत ने कहा कि मुआवजे के लिए संपत्ति पर स्वामित्व या कानूनी हित साबित करना अनिवार्य है। याचिकाकर्ता ने अधिग्रहीत भूमि और उस पर लगे पेड़ों के लिए मुआवजा प्राप्त करने की बात स्वीकार की थी। हालांकि, वह अधिग्रहित भूमि के बाहर गोशाला और पेड़ों को हुए नुकसान को साबित नहीं कर पाए, इसलिए अदालत ने याचिका को सुनवाई योग्य नहीं माना और उसे खारिज कर दिया।