दोषी को 1.30 लाख रुपये का मुआवजा देने के भी आदेश
अदालत की टिप्पणी-दोषी को चेक बाउंस में सजा नहीं देने से जाएगा गलत संदेश
संवाद न्यूज एजेंसी
रामपुर बुशहर। चेक बाउंस के मामले में सरकारी ठेकेदार को छह माह के साधारण कारावास की सजा सुनाई गई है। अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट रामपुर की अदालत ने दोषी मंगत राम निवासी गांव कंधर, तहसील सुंदरनगर, जिला मंडी को 1.30 लाख रुपये का मुआवजा देने के भी आदेश दिए हैं। अदालत ने टिप्पणी की है कि जहां तक बचाव पक्ष के वकील की ओर से दोषी को रिहा करने के तर्क का प्रश्न है, तो दोषी उस लाभ पाने का हकदार नहीं है, क्योंकि इससे समाज में यह गलत संदेश जाएगा कि चेक जारी करने के बाद चूककर्ता को कोई दंड नहीं दिया जा रहा है। इससे लोग अपने खातों में पर्याप्त धनराशि न होने पर भी चेक जारी करने के लिए प्रोत्साहित होंगे। मामले में शिकायतकर्ता जेसीबी मशीन का मालिक है। मामले में आरोपी व्यक्ति सरकारी ठेकेदार था और लोक निर्माण विभाग की सड़क का निर्माण कार्य ठेके के आधार पर करता था। आरोपी ने शिकायतकर्ता को बताया कि उसने सरपारा-कंधार सड़क का निर्माण कार्य लिया है। सड़क निर्माण के लिए जेसीबी मशीन की आवश्यकता है। बार-बार अनुरोध करने पर शिकायतकर्ता ने मशीन देने पर सहमति व्यक्त की। आरोपी ने मशीन किराये पर ली और निर्माण कार्य शुरू कर दिया। सड़क निर्माण पूरा होने के बाद शिकायतकर्ता और आरोपी के बीच हिसाब-किताब तय किया गया। हिसाब-किताब के अनुसार आरोपी की ओर से शिकायतकर्ता को एक लाख रुपये का भुगतान करना था। आरोपी ने जल्द ही पूरी राशि का भुगतान करने का वादा किया, लेकिन वह बाद में राशि का भुगतान करने में विफल रहा। शिकायतकर्ता के बार-बार अनुरोध और मांग पर आरोपी ने 13 जनवरी 2020 को एक लाख रुपये का पोस्टडेटेड चेक जारी किया। शिकायतकर्ता ने बैंक में चेक को प्रस्तुत किया। बैंक ने चेक को अपर्याप्त धन की टिप्पणी के साथ बिना भुगतान के वापस कर दिया। शिकायतकर्ता ने आरोपी से फिर राशि की मांग की, लेकिन वह टालता रहा। इसके बाद शिकायतकर्ता ने डाक के माध्यम से आरोपी को एनआई अधिनियम की धारा 138 के तहत वैधानिक मांग नोटिस भेजा, जिसमें उसे नोटिस प्राप्त होने की तिथि से वैधानिक अवधि के भीतर एक लाख रुपये के चेक का भुगतान करने के लिए कहा गया। आरोपी को नोटिस प्राप्त हुआ, लेकिन उसने कोई भुगतान नहीं किया। परिणामस्वरूप, मामला अदालत में दायर किया गया। अदालत में आरोपी खुद को बेगुनाह साबित करने में विफल रहा। सुनवाई के बाद अदालत ने उपरोक्त निर्णय दिया।