हरिकृष्ण शर्मा
आनी(कुल्लू)। क्षेत्र के आराध्य देवता श्री शमशरी महादेव मंदिर में मकर संक्रांति पर हजारों की संख्या में श्रद्धालुओं के पहुंचने की संभावना है। शमशरी महादेव मंदिर शमशर नदी के त्रिवेणी संगम पर स्थित है, जहां महादेव भू लिंग रूप में विराजमान हैं। साथ ही मंदिर में ब्रह्मा, विष्णु, महेश और माता शक्ति एक ही मूर्ति में दर्शन देते हैं, जो इस मंदिर की विशिष्ट पहचान है। दूरदराज से आने वाले भक्त महादेव के दर्शन कर स्वयं को सौभाग्यशाली मानते हैं। शमशरी महादेव के मुख्य पुजारी देवराज शर्मा बताते हैं कि हजारों वर्ष पूर्व कमांद गांव का एक ग्वाला प्रतिदिन अपनी गायें चराने शमशर नदी के त्रिवेणी संगम पर आता था। उसकी एक गाय रोज झुंड से अलग होकर एक विशेष स्थान पर चली जातीं और वहां स्वत: ही दूध छोड़ देती थीं। यह देख ग्वाला अचंभित हो गया। एक दिन उसने गाय का पीछा किया और देखा कि वह एक वृक्ष के नीचे दूध अर्पित कर रही है। जब ग्वाले ने उस स्थान को खोदना शुरू किया, तो वहां पिंडी रूप में स्वयं महादेव प्रकट हुए। इसके बाद विधिवत रूप से लिंग की स्थापना की गई और तभी से शमशरी महादेव की पूजा-अर्चना की परंपरा शुरू हुई। इस ऐतिहासिक घटना की स्मृति में आज भी हर वर्ष मकर संक्रांति के दिन कमांद गांव के उसी परिवार की ओर से दूध और घी महादेव को अर्पित किया जाता है। यह परंपरा पीढ़ी-दर-पीढ़ी निभाई जा रही है। बुधवार को मकर संक्रांति के अवसर पर शमशरी महादेव के अधिकार क्षेत्र की 12 पंचायतों के लोग अपने आराध्य के दर्शन के लिए मंदिर पहुंचेंगे। इसके अलावा बाहरी क्षेत्रों से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां शीश नवाने पहुंचते हैं। मंदिर में टांकरी भाषा में लिखे गए एक प्राचीन लेख के अनुसार यह मंदिर करीब दो हजार वर्ष पुराना बताया जाता है। मकर संक्रांति के दिन शमशरी महादेव मंदिर न केवल आस्था का केंद्र बनेगा, बल्कि हिमाचल की प्राचीन धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत का सजीव उदाहरण भी प्रस्तुत करेगा।