दो दिन के बाद बंद होंगे चूड़धार मंदिर के कपाट
हर साल देवठन एकादशी के पर्व पर होता है धार्मिक कार्यक्रम का आयोजन
संवाद न्यूज एजेंसी
चौपाल (रोहड़ू)। देवठन (देव उठनी एकादशी) पर्व पर नेरवा, चौपाल, सिरमौर और जौनसार बाबर क्षेत्र के आराध्य देवता बिजट महाराज अपने बड़े भ्राता शिरगुल महाराज से मिलने चूड़धार पहुंचे। इस मौके पर देवता के साथ हामल, चंदलोग, बाहल और चेहता क्षेत्र से हजारों की संख्या में श्रद्धालु भी चूड़धार पहुंचे। चूड़धार पहुंचने पर बिजट महाराज का स्नान के बाद उनके बड़े भाई शिरगुल महाराज के साथ हजारों श्रद्धालुओं की मौजूदगी में भव्य मिलन हुआ। इसके बाद देवता बिजट महाराज अपने बड़े भ्राता शिरगुल से विदा लेकर अपने निवास स्थान सराहां पहुंचे। उन्होंने मंदिर के बाहर प्रांगण में एकत्रित हजारों श्रद्धालुओं को दर्शन दिए। इसके बाद मंदिर में विराजमान हो गए। चूड़ेश्वर सेवा समिति के केंद्रीय संयोजक हरिनंद मेहता ने कहा कि देवठन पर्व के बाद चूड़धार में भारी बर्फबारी के बाद मंदिर के पुजारी, चूड़ेश्वर सेवा समिति के समस्त पदाधिकारी व सदस्य, मंदिर कमेटी के सदस्य एवं सभी होटल-ढाबे वाले चूड़धार से चले जाते हैं। बर्फबारी के बाद चूड़धार में खाने-पीने और ठहरने की कोई भी व्यवस्था नहीं होती है। उन्होंने कहा कि देव परंपरा के अनुसार हिंदी महीने पौष की संक्रांति पर देवता शिरगुल की सहमति से पौल लगाकर बैसाख माह की संक्रांति तक कपाट बंद रखने की सदियों पुरानी परंपरा है। दिसंबर में संक्रांति वाले दिन चार माह की पौल लगने के बाद बैसाख यानी अप्रैल की संक्रांति को मंदिर के कपाट खोलकर देवता की विधिवत विशेष पूजा की रस्म आज भी निभाई जाती है। बैसाखी पर्व पर चूड़धार मंदिर में पौल लगाने के लिए हामल, बाहल, चेहता और चंदलोग से श्रद्धालु बुरांस के फूल लेकर चूड़धार पहुंचते हैं। इन फूलों को देवता के चरणों में समर्पित कर विधिवत रूप से मंदिर के कपाट खोल दिए जाते हैं।