. चेक बाउंस मामले में ठेकेदार की अपील खारिज, छह माह की सजा बरकरार
संवाद न्यूज एजेंसी
रामपुर बुशहर।
चेक बाउंस मामले में रामपुर स्थित सत्र न्यायालय किन्नौर ने आरोपी की अपील खारिज करते हुए निचली अदालत के दोषसिद्धि और सजा के फैसले को बरकरार रखा है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि हस्ताक्षरित खाली चेक को सुरक्षा के तौर पर देने या उस पर राशि किसी अन्य व्यक्ति की ओर से भरने मात्र से चेक अमान्य नहीं हो जाता। यदि चेक प्रस्तुत किए जाने के समय उससे संबंधित कानूनी देनदारी मौजूद है, तो उसके अनादर पर परक्राम्य लिखत अधिनियम की धारा 138 के तहत कार्रवाई हो सकती है। सत्र न्यायाधीश की ओर से सुनाए फैसले में अश्वनी शांडिल की अपील खारिज कर दी। अदालत ने इस मामले में आरोपी को छह माह के साधारण कारावास और 4.20 लाख रुपये मुआवजा देने की सजा सुनाई थी। मामले के अनुसार, शिकायतकर्ता छेवांग दोर्जे पेशे से ट्रांसपोर्टर हैं। उन्होंने शिकायत में बताया था कि सिविल ठेकेदार अश्वनी शांडिल ने उनसे एक वाहन खरीदा था। हिसाब-किताब के बाद आरोपी पर चार लाख रुपये बकाया थे। इस राशि के भुगतान के लिए आरोपी ने एक लाख रुपये और तीन लाख रुपये के दो चेक जारी किए थे। शिकायतकर्ता ने चेक बैंक में जमा करवाए, लेकिन खाते में पर्याप्त राशि नहीं होने के कारण दोनों चेक अनादरित हो गए। इसके बाद शिकायतकर्ता ने 25 अप्रैल 2015 को आरोपी को कानूनी नोटिस भेजा। भुगतान नहीं होने पर परक्राम्य लिखत अधिनियम की धारा 138 के तहत शिकायत दर्ज करवाई गई। आरोपी ने अपील में दलील दी कि चेक सुरक्षा के तौर पर दिए गए थे और शिकायतकर्ता ने उनका दुरुपयोग किया। उसने यह भी दावा किया कि बकाया राशि का कुछ भुगतान नकद किया गया था और निचली अदालत ने इस पहलू पर उचित विचार नहीं किया। सत्र न्यायालय ने इन दलीलों को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने कहा कि चेक पर हस्ताक्षर और उसके आरोपी के बैंक खाते से संबंधित होने पर विवाद नहीं था। ऐसे में कानून के तहत यह अनुमान लगाया जाता है कि चेक किसी ऋण या कानूनी देनदारी के भुगतान के लिए जारी किया गया था। इस अनुमान को खारिज करने के लिए आरोपी को विश्वसनीय साक्ष्य प्रस्तुत करने होते हैं। अदालत ने यह भी कहा कि आरोपी की ओर से आंशिक भुगतान किए जाने का दावा किया गया, लेकिन उसके समर्थन में पर्याप्त साक्ष्य पेश नहीं किए गए। हस्ताक्षरित खाली चेक दिए जाने की दलील भी अपने आप में बचाव का पर्याप्त आधार नहीं है। इन तथ्यों और कानूनी प्रावधानों के आधार पर सत्र न्यायालय ने माना कि निचली अदालत के फैसले में हस्तक्षेप करने का कोई पर्याप्त आधार नहीं है। इसके साथ ही आरोपी की अपील खारिज कर दोषसिद्धि और सजा को बरकरार रखा गया।