करसोग के सेब बहुल क्षेत्रों में बगीचों में परागण प्रक्रिया के लिए लाई गई मधुमक्खियां
सेब की गुणवत्ता और उत्पादन में महत्वपूर्ण रहती है परागण प्रक्रिया
संवाद न्यूज एजेंसी
करसोग (मंडी)। यूरोपियन मधुमक्खी न केवल बागवानों के जीवन में खुशहाली का रस घोल रही हैं, बल्कि सेब की गुणवत्ता भी बढ़ा रही है। प्रदेश के सेब बहुल क्षेत्रों में इन दिनों मधुमक्खियों के बॉक्स आना शुरू हो गए हैं। सेब के फूलों के खिलने पर मधुमक्खियां एक फूल से दूसरे फूल पर भ्रमण कर परागण प्रक्रिया पूरी कर रही हैं। सेब के लिए परागण प्रक्रिया बहुत जरूरी है। इससे उच्च गुणवत्ता के सेब के साथ फलोत्पादन में बढ़ोतरी होती है। विषय विशेषज्ञ डॉ. शरद गुप्ता ने बताया कि यूरोपियन एपिस मेलिफेरा मधुमक्खी आकार में बड़ी होने के कारण अधिक पराग कण लेकर चलती है। बागवान 3-4 बीघा क्षेत्र में एक मधुमक्खी का डिब्बा रख सकते हैं। इसमें कम से कम 7-8 फ्रेम में मधुमक्खियां और एक फ्रेम ब्रूड भी होनी चाहिए। बॉक्स में रानी मक्खी की जांच कर लें। एक शक्तिशाली मौन वंश तीन कमजोर मौन वंशों की अपेक्षा बेहतर है। परागण एक महत्वपूर्ण जैविक प्रक्रिया है, जो पौधों के प्रजनन और फलने-फूलने के लिए आवश्यक होती है। इसमें परागकण को नर भाग (पुंकेसर) से मादा भाग (वर्तिकाग्र) तक पहुंचाया जाता है, जिससे निषेचन होता है। परागण में हवा, पानी, कीट-पतंगे, पक्षी आदि योगदान देते हैं, लेकिन मधुमक्खियां सबसे प्रभावी परागणकर्ताओं में से एक मानी जाती हैं। बगीचे में मधुमक्खियों के बॉक्स रखने के बाद ध्यान रखें कि कम से कम 10-15 मक्खियां प्रति मिनट अंदर-बाहर आ जा रही हों। वर्ष 1962 में यूरोपियन मधुमक्खी, जिसे एपिस मेलिफेरा के नाम से जाना जाता है, भारत में सफलतापूर्वक लाई गई थी।