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Election 2022: मंडी जिले ने जयराम का दिया साथ, कांग्रेस का किया सूपड़ा साफ

Fri, 09 Dec 2022 04:31 PM IST
शिमला ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, मंडी

सार

मंडी जिला मुख्यमंत्री के चेहरे जयराम के साथ चला। ओपीएस, महंगाई और बेरोजगारी जैसे मुद्दों को दरकिनार कर जनता ने जयराम का पूरा साथ दिया। नतीजतन हिमाचल में चारों खाने चित्त होने वाली भाजपा को मंडी जिले से प्रचंड जीत मिली। इस जीत से भाजपा 2017 का इतिहास दोहराने में कामयाब हुई, वहीं अपना वर्चस्व कायम रखा।
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जीत के बाद अनिल शर्मा समर्थकों के साथ। - फोटो : संवाद
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विस्तार
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 हिमाचल प्रदेश के मंडी जिला मुख्यमंत्री के चेहरे जयराम के साथ चला। ओपीएस, महंगाई और बेरोजगारी जैसे मुद्दों को दरकिनार कर जनता ने जयराम का पूरा साथ दिया। नतीजतन हिमाचल में चारों खाने चित्त होने वाली भाजपा को मंडी जिले से प्रचंड जीत मिली। इस जीत से भाजपा 2017 का इतिहास दोहराने में कामयाब हुई, वहीं अपना वर्चस्व कायम रखा। हालांकि लंबी जद्दोजहद के बाद मंडी को मिला मुख्यमंत्री का सिंहासन अब छूट गया। वहीं अंतर्कलह के बावजूद कांग्रेस ने रिवाज नहीं ताज बदलने के अपने नारे को सार्थक सिद्ध कर सत्ता वापसी की है। सीएम के गृह जिले में अपने खोए जनाधार को वापस करने में कांग्रेस नाकाम हुई है।

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यह बदला ट्रेंड
मंडी जिले की 10 में से नौ सीटों पर जीत दर्ज करने के बावजूद भी भाजपा को सत्ता में वापसी का मौका नहीं मिला है। आम तौर पर जब-जब भी मंडी में नौ से अधिक सीटों पर जिस पार्टी का कब्जा रहा है, वो सत्ता के सिहांसन पर काबिज होती रही है।

मंडी में बड़े उलटफेर
मुख्यमंत्री पद के दावेदार कांग्रेस के दिग्गज कौल सिंह चेले से हारे
मंडी जिले से कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और मुख्यमंत्री पद के दावेेदार कौल सिंह ठाकुर अपनी जीत को लेकर आश्वस्त थे। कहते हैं कि राजनीति के रंग अनोखे हैं। पिछली बार अपने गढ़ द्रंग से हार का मुंह देखने वाले कौल इस बार भाजपा के पूर्ण ठाकुर से चुनाव हार गए। हालांकि, उनकी ओर से दोबारा मतगणना करवाई गई। इसके बावजूद भी वे अपने राजनीतिक शिष्य पूर्ण ठाकुर से 618 मतों से चुनाव हार गए।
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पावरफुल मंत्री महेंद्र का बेटा सियासी जंग के मैदान में चित्त
कांग्रेस को मंडी जिला में एकमात्र सीट धर्मपुर में मिली है। यह सीट छह बार विधानसभा चुनाव जीतने वाले जयराम सरकार में नंबर दो पावरफुल मंत्री महेंद्र सिंह रहे हैं। राजनैतिक विरासत को संभालने के लिए मंत्री के बेटे रजत को टिकट मिला लेकिन सियासी जंग में वह चारों खाने चित्त हो गए।

बागियों का नहीं चला जादू, रोकर भाजपा छोड़ने वाले प्रवीण 4,106 पर सिमटे
जिले में बागियों का जादू नहीं चला। मंडी सदर से बगावत कर आजाद चुनावी रण में उतरे प्रवीण महज 4,106 वोटों पर सिमट गए। भाजपा छोड़ते समय वह सार्वजनिक रूप में रोए थे और वोटों की अपील भी की थी। मंडी सदर की जनता ने बगावत को नहीं अपनाया और सुखराम परिवार के साथ चल अनिल शर्मा को जीत दिलाई। हालांकि अनिल चार साल भाजपा से रुष्ट ही रहे। सुंदरनगर से भाजपा के पूर्व मंत्री रूप सिंह के अभिषेक, नाचन से ज्ञान भी कुछ खास नहीं कर पाए।

मंडी की जनता ने नकारा परिवारवाद
 जिले ने यह इतिहास भी रचा है। परिवारवाद को जनता ने पूरी तरह से नकारा है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता कौल सिंह और उनकी बेटी चंपा ठाकुर को जनमत नहीं दिया। पिता द्रंग और पुत्री मंडी से सियासी बाजी हारीं। धर्मपुर से जीत का सिक्सर मारने वाले भाजपा के कद्दावर नेता अपने बेटे रजत को राजनीति में सेट करने की कोशिश में धराशायी हो गए। वहीं, अपनी बेटी जिला परिषद सदस्य वंदना चौहान की सियासी राहें भी कठिन कर दी हैं।
कांग्रेस में पिता-पुत्री और भाजपा में पिता-पुत्र की सियासत मंझधार में है। हालांकि सदर मंडी में भी धर्मसंकट में फंसकर अनिल शर्मा भाजपा से दूर रहे। लेकिन राजनीति के चाणक्य पंडित सुखराम का परिवार चुनावों से पहले भाजपा में शामिल हो गया। उनके बेटे आश्रय शर्मा ने कांग्रेस के सभी पदों से त्यागपत्र दे दिया और पिता की वर्करी के लिए चुनाव मैदान में जुट गए।

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