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जोगिंद्रनगर खोने लगा अपनी व्यापारिक पहचान

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जोगिंद्रनगर (मंडी)। वर्ष 1990 से पहले का एकमात्र प्रदेश का व्यापारिक स्थान जोगिंद्रनगर अब व्यापार को लेकर अपनी पहचान पूर्ण रूप से खो चुका है। वर्ष 1970 से लेकर वर्ष 1985 तक जोगिंद्रनगर प्रदेश का एक मात्र व्यापारिक स्थान था, जहां पर देश के विभिन्न प्रांतों पंजाब, दिल्ली और उत्तरप्रदेश सहित विदेशों से भी अफगानिस्तान के पठान और पाकिस्तान के काबुल और अन्य हिस्सों से यहां पर व्यापार करने के लिए व्यापारी आते थे। यहां पर चौहारघाटी का आलू, राजमाह, देवदार और कायल की इमारती लकड़ी सहित यहां की खादानों से निकलने वाला काला नमक (सेंधा नमक) आदि को लेने के लिए दूर-दूर से व्यापारी यहां पर आते थे। यहां का आलू और सेंधा नमक पाकिस्तान तथा अफगानिस्तान तक भेजा जाता था। उस समय जहां एक तरफ एकमात्र अंग्रेजों की जमाने की रेल सुविधा-मालगाड़ी सामान को यहां से देश के अन्य हिस्सों में उपरोक्त सामान पहुंचाने में भाग्य रेखा का काम करती थी, वहीं पर जोगिंद्रनगर के लिए यह ही मालगाड़ी कोयला पहुंचाने में भी कारगर थी। वर्ष 1985 तक यहां पर व्यापारियों का जमावड़ा लगा रहता था। जहां एक तरफ प्रदेश के व्यापारी सामान खरीद-फरोख्त करने के लिए आते थे, वहीं पर धीरे-धीरे इसके बाद प्रदेश में सड़कों का जाल बिछना शुरू हो गया और यातायात की सुविधा भी शहरों से लेकर ग्रामीण क्षेत्रों तक किसानों को मिलने लगी। प्रदेश में यातायात के बढ़ने से जहां रेलवे विभाग ने भी अपने हाथ पीछे खींचने शुरू कर दिए तथा यहां पर आने वाली रेल (मालगाड़ी) को वर्ष 1988 में बंद कर दिया गया। इसके उपरांत कुल्लू और मंडी से यहां पहुंचने वाली नकदी फसल सीधे दिल्ली और अन्य मंडी तक सीधे ट्रकों के माध्यम से पहुंचने लगी। इसी के चलते यहां से विदेशों में जाने वाला सेंधा नमक की गुम्मा खान पर भी संकट के बादल छाने लगे और लगभग वर्ष 2000 के दशक में यह महत्वपूर्ण सेंधा नमक की खान भी पहाड़ी धसने के कारण बंद हो गई। तब से लेकर आज दिन तक केंद्र सरकार के अधीन चलने वाली गुम्मा और द्रंग की नमक खान को सुचारु करने के लिए कई तरह के प्रारूप तैयार किए गए लेकिन यह केवल मात्र कागजों तक ही सिमट कर रह गई। वर्ष 1990 के दशक में जंगलात विभाग के कारपोरेशन बनने से यहां पर इमारती लकड़ी का व्यापार भी समाप्त हो गया। कोयले का व्यापार भी यहां धीरे-धीरे समाप्त हो गया और चौहारघाटी के किसानों को सड़क सुविधा मिलने से वे अपनी नकदी फसल आलू और राजमाह का व्यापार सीधे तौर पर अमृतसर, लुधियाना और दिल्ली की सब्जी मंडी से करने लगे। अब व्यापारी सीधे ही किसानों से संपर्क कर उनका सारा सामान खरीद लेते हैं। क्षेत्र के वृद्ध किसान श्याम लाल, कर्मचंद, धोबीराम, रामदास, नरपत, हरीदास, हरीराम, घनश्याम और फागणु राम आदि कहना था कि वह जमाना कुछ और था और समय इतनी तेजी से बदल गया कि वह सब उन्हें एक सपने जैसा ही लगता है।
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