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प्रवासी मजदूर लौटे, सेब ढुलान के लिए नहीं मिल रहे कामगार

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उदयपुर (लाहौल-स्पीति)। लाहौल घाटी में प्रवासी कामगार अपने घरों के लिए पलायन कर गए हैं। ऐसे में घाटी में सेब ढुलान के लिए मजदूरों की समस्या खड़ी हो गई है। इससे घाटी में आए व्यापारियों के साथ सेब उत्पादक भी परेशान हैं। घाटी में मार्च और अप्रैल में बर्फ पिघलने के साथ लाहौल घाटी में सीजन के लिए बड़ी संख्या में बाहरी राज्यों के साथ नेपाल से कामगार आते हैं। ये दशहरा उत्सव शुरू होने से पहले घाटी से पलायन कर जाते हैं। इन दिनों घाटी में 800 हेक्टेयर भूमि में उत्पादित सेब सीजन जोरों से चल रहा है। व्यापारियों और बागवानों को सेब ढुलान के लिए मजदूर नहीं मिल रहे हैं। सेब उत्पादक अपने स्तर पर फसलों को परिवार या गांव में एक-दूसरे के सहयोग से बगीचों से सड़क तक पहुंचा रहे हैं। कुल्लू से सेब खरीदारी करने आए व्यापारी पवन और राकेश ने बताया कि वे यह सोचकर कुल्लू से सेब ढुलान के लिए मजदूर लेकर लाए कि लाहौल में बड़ी संख्या में कामगार मिलेंगे, मगर मजदूरों के बिना बागवान और व्यापारी परेशान हैं। कुछ खरीदार अपने साथ सेब तुड़ान और ढुलान के लिए मजदूर साथ लेकर आए हैं। लाहौल में सेब सीजन अक्तूबर में शुरू होता है। ठंड के चलते मौसम पर भी भरोसा नहीं किया जा सकता है। हालांकि, अब अटल टनल रोहतांग बनने से पहले की तरह समस्या नहीं है। बर्फबारी हो भी जाए तो कुछ दिन छोड़कर सड़क बहाल होते ही टनल से सेब बाहर निकाला जा सकता है। देश की कुछ मंडियों में लाहौल के सेब ने दस्तक भी दे दी है। घाटी में सेब तुड़ान जोरों से चल रहा है। बागवानों ने मौसम का मिजाज देखकर सेब तुड़ान कर अपने घर के कमरों में ढेर लगा रखे है। सेब खरीदारों का कहना है कि वह सेब तो खरीदने के लिए आए हैं, लेकिन उन्हें ढुलान के लिए मजदूरों की समस्या खड़ी हो गई है। सेब उत्पादकों को एक हजार से लेकर 1300 रुपये तक सेब की प्रति पेटी दाम मिल रहा है। - संवाद
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