खराहल (कुल्लू)। देव महाकुंभ कुल्लू दशहरा में पांच देवता ब्यास के पार से ही भगवान रघुनाथ का अभिनंदन करते हैं। ये देवता खराहल घाटी के गांव डोभी में छह दिन तक अस्थायी शिविर में रहकर देव परंपरा का निर्वहन करते हैं। यह परंपरा सदियों से चली आ रही है। इन देवताओं के कारकूनों का कहना है कि देवताओं के अपने नियम हैं। रघुनाथ की रथ यात्रा से लेकर लंका दहन तक इन देवताओं की हर रोज पूजा-अर्चना होती है। दशहरा की तमाम देव परंपराओं को देव विधिविधान के अनुसार पूरा किया जाता है। दशहरा के अंतिम दिन लंका दहन के बाद ही तमाम देवता अपने देवालय के लिए लौट जाते हैं।
मलाणा के देवता ऋषि जमलू, जाणा के जीवनारायण, सौर के सरवल नाग, तांदला के शुक्री नाग और सोयल के देवता आजीमल ब्यास के पार ही डेरा जमाए रहते हैं। इसी स्थल से देवता अपनी हाजिरी रघुनाथ के समक्ष भरते हैं। शुक्री नाग के पुजारी टिकम राम ने बताया कि सदियों पुराने नियम के मुताबिक देवता ब्यास पार नहीं करते हैं। दशहरा कमेटी के अध्यक्ष सीपीएस सुंदर सिंह ठाकुर बताते हैं कि नियम के अनुसार इन सभी देवताओं को नजराना दिया जाता है। कहा कि दशहरा में ब्यास पार भी देव धुन की मंगलमय ध्वनि सभी को सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करती है। संवाद