कुल्लू। दशहरा उत्सव में भले ही कुल्लवी नाटी लिम्का बुक ऑफ रिकार्ड्स में शामिल हो गई, लेकिन हैरान भरा है कि दशहरा में पहली बार इस ऐतिहासिक मंच में हिमाचल की समृद्ध संस्कृति देखने को नहीं मिली। मात्र कुल्लवी नाटी के अलावा अन्य ग्यारह जिलों की संस्कृति मंच से गायब रही। इसको लेकर जिला के लोगों ने दशहरा उत्सव समिति के खिलाफ नाराजगी जताई है। दशहरा उत्सव में अमूमन हिमाचल के सभी जिलों की संस्कृति की झलक देखने को मिलती थी, लेकिन इस बार कुल्लवी नाटी को छोड़ कर न तो मंडी जिला का लुड्डी नृत्य देखने को मिला और न ही लाहौली-स्पीति की पारंपरिक नाटी। इतना ही नहीं, उत्सव की सांस्कृतिक संध्या में कांगड़ा का झमाकड़ा, पारंपरिक वेशभूषा और वाद्ययंत्रों की धुन पर चंबा का चम्बयाली लोक नृत्य, पांगी लोकनृत्य, गद्दी नृत्य, शिमला की महासू नाटी, सोलन की नाटी, किन्नौरी नाटी, सिरमौर की नाटी के दीदार नहीं हो पाए हैं। यह पहला अवसर है कि जब दशहरा मेें आए लाखों लोग हिमाचली संस्कृति से रूबरू नहीं हो सके। कुल्लू जिलावासी राजेंद्र चौधरी, बाला राम ठाकुर, देवी सिंह, कमल ठाकुर, राम सिंह तथा राकेश शर्मा ने कहा कि दशहरा उत्सव के दौरान ऐतिहासिक लाल चंद प्रार्थी कलाकेंद्र में पूरे हिमाचल की संस्कृति की झलक देखने को मिलती थी, लेकिन हैरान भरा है कि इस बार के दशहरा उत्सव में पहली बार देशी-विदेशी लोगों को भी हिमाचली संस्कृति से महरूम होना पड़ा। उन्होंने कहा कि दशहरा उत्सव कमेटी ने देश तथा विदेश की संस्कृति को पेश तो किया लेकिन हिमाचली संस्कृति को पेश करने में नाकाम रही है। ऐतिहासिक लाल चंद प्रार्थी कलाकें द्र में 12 विदेशी और देश के 15 राज्यों की संस्कृति को दर्शाया गया, लेकिन लोग हिमाचल की संस्कृति से रूबरू नहीं हो पाए।