धर्मशाला। हिमालय नीति अभियान पर्यवेक्षक गुमान सिंह ने कहा कि हिमालय के संरक्षण और यहां की लोगों की रक्षा के मुद्दों को आगामी लोकसभा चुनावों के दौरान सभी राजनीतिक दल अपने घोषणा पत्र में शामिल करें। धर्मशाला में हिमालय के संतुलित विकास को लेकर डिमांड चार्ट के बारे में प्रेसवार्ता को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि जिस तरह से हर साल आपदा हिमालय क्षेत्रों में आ रही है। उसके लिए यहां के हिमालयी राज्यों के लिए अतिरिक्त बजट और संरक्षण भारत सरकार की जिम्मेवारी है।
उन्होंने कहा कि जिस तरह से विकास के नाम पर पहाड़ों में पर्यावरण से छेड़छाड़ की जा रही है। उससे आने वाले समय में पानी का संकट आएगा। जिसका सीधा असर उत्तरी राज्याें के साथ निचले एशिया में भी होगा। पहाड़ों में निचले राज्यों की आबादी को बसाना भी सरकारें करें बंद। उन्होंने कहा कि हिमालय संरक्षण को लेकर पहाड़ी राज्यों के संगठनों ने एक कार्यशाला की है। इसमें हिमालय संरक्षण के मुद्दों को दिल्ली में पार्टियों के समक्ष रखा जाएगा।
वहीं, हिमालय नीति अभियान के अध्यक्ष कुलभूषण उपमन्यू ने कहा कि हिमालयी राज्यों में विकास कहीं से भी टिकाऊ नहीं है। बढ़े विकास कार्यों के नाम पर पर्यावरण की सुरक्षा के साथ खिलवाड़ हो रही है। मौजूदा समय में आधी से ज्यादा आपदाएं मानव निर्मित हैं। बीते साल प्रदेश में हुई आपदा फोरलेन निर्माण का ही परिणाम है।
विकास के नाम पर पहाडों की खुदाई से आने वाले समय में ग्लेशियर सूखेंगे। इससे देश में पानी कम होगा। प्रदेश में बहुत से ऐसे क्षेत्र हैं जहां, छोटे से छोटे नालों पर भी हाइड्रो परियोजनाओं का निर्माण किया जा रहा है। नदियों के किनारे मड डंपिंग हो रही है। जिससे वहां के लोगों के लिए खतरा बना रहा है। इस दौरान विमला विश्वप्रेमी, दिनेश नेगी, संदीप मिन्हास और अन्य सदस्य मौजूद रहे।
मौसमी परिवर्तन होना सही नहीं
यूएनओ में क्लाइमेट सदस्य रहे सौम्या दता ने कहा कि हिमालय राज्य भूकंप की दृष्टि से संवेदनशील है। 30 साल पहले जो बारिश 45 दिन होती थी। वे बरसात अब 25 दिन में हो जाती है। मौसमी परिवर्तन होना सही नहीं है। मौजूदा समय में पानी का संकट शुरू हो चुका है। यही हालत रहे तो बार-बार बाढ़ आएंगे। इससे सीधे तौर पर हिमाचल, जम्मू-कश्मीर और लद्दाख क्षेत्र प्रभावित होंगे। सरकारों की ओर से इस परिवर्तन से निपटने को लेकर कोई प्लान नहीं बनाया गया। सरकार को इस पर योजना बनाए।