पालमपुर (कांगड़ा)। नेशनल इंस्टीट्यूशन रैकिंग फ्रेमवर्क (एनआईआरएफ) की रैकिंग में कृषि विश्वविद्यालय पालमपुर 14वें से 19वें स्थान पर खिसक गया है। सूत्रों की मानें तो रैंकिंग मापदंडों का विश्लेषण बताता है कि विवि के टीचिंग लर्निंग रिसोर्सेज (शिक्षण, सीखना और संसाधन) में 100 में से 79 अंक हैं। ग्रेजुएट आउटकम (स्नातक परिणाम) में भी विवि का 72 अंक के साथ प्रदर्शन अच्छा है। अनुसंधान और व्यवसायिक अभ्यास (रिसर्च प्रैक्टिस) विवि को 100 में से 28 अंक और समाज में विश्वविद्यालय की धारणा एवं छवि (पब्लिक परसेप्शन) में महज 32 अंक ही मिले हैं, जो निराशजनक प्रदर्शन है। रैंकिंग पिछले तीन वर्षों के आंकड़ों के आधार पर की जाती है।
रैंकिंग के गिरने की वजह अनुसंधान से उत्पन्न गुणवत्ता प्रकाशन यानी क्वालिटी पब्लिकेशन और इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी राइट, जिसमें मात्र शून्य अंक ही प्राप्त हुआ है। विवि की रैंकिंग कम आंके जाने का कारण पिछले करीब एक साल से नियमित कुलपति का न होना भी माना जा रहा है। स्थायी कुलपति का न होने का सीधा प्रभाव विवि के शिक्षा, शोध और प्रसार समेत अन्य कई चीजों पर पड़ रहा है।
कृषि विवि पालमपुर की रैकिंग गिरना चिंताजनक : अशोक सरियाल
कृषि विश्वविद्यालय पालमपुर के पूर्व कुलपति प्रो. अशोक सरियाल ने कहा कि विवि लगातार तीसरी बार रैंकिंग में लुढ़की है। जो चिंताजनक है। उनके कार्यकाल 2016 में कृषि विश्वविद्यालय अखिल भारतीय रैंकिंग में 23वें स्थान से उछल कर 2020 में 11वें स्थान पर पहुंच गया था। इससे उनकी उपलब्धि मान कर उनके सेवाकाल को एक वर्ष बढ़ा दिया गया था। पिछले तीन वर्षों से विश्वविद्यालय की रैंकिंग हर वर्ष गिरती जा रही है। इस वर्ष की रैंकिंग में 19वां स्थान प्राप्त हुआ है, जबकि कुल 76 में से केवल 40 देश की कृषि विश्वविद्यालय ही भाग ले पाए हैं। इसका कारण विश्वविद्यालय में पिछले एक वर्ष से पूर्णकालिक कुलपति का न होना, विशेषज्ञ अनुसंधान वैज्ञानकों को प्राकृतिक खेती जैसी परियोजनाओं से हटाना, अनुसंधान का वित्तीय संकट, गेट और दीवारों के पुनर्निर्माण पर वित्तीय अपव्यय की जांच समेत कई कारण रहे है।
पिछले तीन साल से लगातार विवि की रैकिंग गिर रही है। एनआईआरएफ की उच्च रैंकिंग से संस्थान को कई लाभ मिलते हैं। साथ ही देश-विदेश से आने वाले छात्रों को भी प्रोत्साहन मिलता है, लेकिन विवि की रैंकिंग गिरने से इसका प्रभाव कई बातों पर पड़ेगा।