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सुरजीत को एंबुलेंस मिल जाती तो शायद बच जाती जान 16-36-56

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परागपुर (कांगड़ा)। देहरा के सुनेहत में दयाल (नैहरनपुखर) चनोहता रोड के सुरजीत कुमार (45) को यदि समय पर एंबुलेंस मिल जाती तो शायद उनकी जान बच जाती। शनिवार रात को एक ओर सुरजीत जिंदगी की जंग लड़ रहा था तो दूसरी ओर देहरा अस्पताल में लचर स्वास्थ्य व्यवस्था की पोल खुल रही थी। क्योंकि, सुरजीत को टांडा रेफर करने के दौरान अस्पताल में दो 108 एंबुलेंस खड़ी थीं, लेकिन एक भी सुरजीत को टांडा ले जाने के लिए तैयार नहीं थी। बताया जा रहा था कि एक खराब है तो दूसरी के कागज पूरे नहीं हैं। सवाल यह है कि अगर खराब थी तो उसे ठीक क्यों नहीं करवाया गया। इतना ही नहीं, जब निजी रोगी वाहन के माध्यम से जब सुरजीत को टांडा ले जाया जाने लगा तो सरकारी चालकों ने विरोध करना शुरू कर दिया। उनका कहना था कि तीसरी एंबुलेंस टांडा से वापस आ रही है। अस्पताल प्रशासन, चालकों और अन्य कर्मचारियों के करीब ढाई घंटे चले ड्रामे के बाद मरीज को टांडा ले जाया गया। लंबे इंतजार के बाद सुरजीत को निजी रोगी वाहन से जब टांडा अस्पताल ले जाया गया, तो राणीताल के समीप बाथू पुल पर टांडा अस्पताल से आ रही 108 एंबुलेंस में सुरजीत को बिठाकर टांडा ले जाया गया, लेकिन तब तक काफी देर हो चुकी थी। टांडा अस्पताल के गेट पर ही सुरजीत ने दम तोड़ दिया। एलआईसी की देहरा ब्रांच में काम करने वाले सुरजीत हालांकि सायं छह बजे के करीब अपने घर आए थे, लेकिन वित्तीय वर्ष के समापन पर कार्यालय में काम होने के कारण फिर दफ्तर चले गए। फिर दफ्तर से करीब आठ बजे काम करके बाइक पर घर को निकले थे। मात्र 15 मिनट में ही सुरजीत की बाइक सुनेहत में दुर्घटना ग्रस्त हो गई। हंसमुख सुरजीत हमेशा लोगों को धीमी गति से वाहन चलाने की सलाह देते थे। उनकी बाइक की स्पीड भी कभी ज्यादा नहीं होती थी। सुरजीत की बड़ी बेटी ढलियारा कॉलेज में प्रथम वर्ष की छात्रा है, जबकि छोटी बेटी आदर्श स्कूल परागपुर में जमा दो और बेटा आदर्श स्कूल देहरा में आठवीं का छात्र है।
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एसएमओ बोले-कुछ नहीं कह सकते
उधर, एसएमओ देहरा गुरमीत सिंह ने बताया कि दुर्घटना में घायल को एंबुलेंस मिलने में देरी क्यों हुई। इस संबंध में वह कुछ नहीं बता सकते हैं।
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