भोटा(हमीरपुर)। शिव मंदिर सौर में आयोजित शिव महापुराण कथा में कथा व्यास निर्मल सारस्वत ने शिव-पार्वती विवाह का प्रसंग सुनाया। माता सती ने अपने पिता दक्ष के यज्ञ में आत्मदाह करने के बाद हिमालयराज और मैना के घर पार्वती के रूप में जन्म लिया। नारद मुनि के उपदेश से पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए वर्षों तक निराहार रहकर घोर तपस्या की। उनकी भक्ति इतनी अटल थी कि उन्होंने केवल वायु और पत्तों पर जीवित रहकर अपर्णा नाम प्राप्त किया। जब देवताओं ने शिव की समाधि भंग करने के लिए कामदेव को भेजा, तो क्रोधित होकर शिव ने अपनी तीसरी आंख से कामदेव को भस्म कर दिया। भगवान शिव ने स्वयं एक बटुक (ब्रह्मचारी) का रूप धारण कर पार्वती की परीक्षा ली। उन्होंने शिव की कमियां गिनाईं और उनकी निंदा की, लेकिन पार्वती अपने संकल्प पर अडिग रहीं। उनकी अटूट निष्ठा देखकर शिव अत्यंत प्रसन्न हुए और उन्हें अपनी अर्धांगिनी के रूप में स्वीकार किया। संवाद