धर्मशाला के दाड़नू निवासी सूबेदार मेजर पुरुषोत्तम ठाकुर
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1971 में भारतीय सेना ने अपने अदम्य साहस से पाकिस्तानी सेना को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया था। अगर 16 दिसंबर को पाकिस्तानी सेना ने अपने हथियार नहीं डाले होते तो भारतीय सैनिक लाहौर को भी अपने कब्जे में ले सकते थे।
1971 में पाकिस्तान के साथ भारत ने सैकड़ों जवानों को खोया था। इसके बावजूद भारतीय सेना ने पाकिस्तानी नागरिकों के प्रति दया दिखाई और उन्हें खाने को दिया था। 1971 के युद्ध में नए-नए सिपाही भर्ती हुए धर्मशाला के दाड़नू निवासी सूबेदार मेजर पुरुषोत्तम ठाकुर ने बताया कि वह 19 दिसंबर 1968 को सेना की फस्ट डोगरा रेजिमेंट में भर्ती हुए थे।
1969 के अंत में प्रशिक्षण लेने के बाद 1970 में अपनी यूनिट फस्ट डोगरा रेजिमेंट में चले गए। तीन दिसंबर 1971 को जब भारत-पाकिस्तान के बीच युद्ध शुरू हुआ तो उनकी यूनिट को जम्मू-कश्मीर में तैनात कर दिया।
रावी पार कर पाकिस्तान के नैनाकोट पहुंची सेना
भारत की तीनों सेनाओं ने पाकिस्तान के सैनिकों को मारते हुए आगे बढ़ना शुरू किया। उनकी यूनिट छह दिसंबर को पाकिस्तान के सकरगढ़ में पहुंच गई। इसके बाद भारतीय सेना रावी पार करते हुए सात दिसंबर की रात पाकिस्तान के नैनाकोट पहुंच गई थी। सुबह जब नैनाकोट में देखा तो पाकिस्तानी के कुछ लोग ही वहां बचे थे।