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ऐसे थे मेजर मनकोटिया: खुद को कभी वोट नहीं कर पाए, सियासत में हमेशा अपनी शर्तों पर जिए; राजनीति के खास किस्से

Tue, 29 Sep 2026 04:36 PM IST
Ankesh Dogra संवाद न्यूज एजेंसी, धर्मशाला।

सार

मेजर विजय सिंह मनकोटिया के निधन के साथ हिमाचल की राजनीति ने एक ऐसे नेता को खो दिया, जिसकी पहचान सिर्फ पदों से नहीं बल्कि बेबाक अंदाज और सैनिक वाली स्पष्टता से बनी। शाहपुर विधानसभा क्षेत्र से पांच बार चुनाव जीतने वाले मनकोटिया का सियासी सफर कई दिलचस्प और विवादित घटनाओं से भरा रहा। सबसे रोचक बात यह रही कि पांच बार विधायक बनने के बावजूद वह कभी खुद को वोट नहीं कर पाए। जानें विस्तार से...
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मेजर मनकोटिया की अनोखी सियासत - फोटो : अमर उजाला नेटवर्क
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विस्तार
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हिमाचल की सियासत में कुछ नेता ऐसे होते हैं, जिनकी पहचान चुनाव जीतने या मंत्री बनने से आगे निकल जाती है। मेजर विजय सिंह मनकोटिया भी ऐसे ही नेताओं में शुमार रहे। सैनिक पृष्ठभूमि से राजनीति में आए मनकोटिया ने सार्वजनिक जीवन में भी अपनी बेबाकी और साफगोई को नहीं छोड़ा। उनके निधन के साथ पहाड़ की राजनीति में बेबाक राजनीति का एक अध्याय खत्म हो गया है।
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सैनिक अनुशासन और राजसी अंदाज के लिए पहचाने जाने वाले मनकोटिया ने राजनीति में भी अपनी शैली नहीं बदली। वह कई बार विवादों के केंद्र में रहे, लेकिन यही विवाद उन्हें लंबे समय तक हिमाचल की राजनीति में प्रासंगिक भी बनाए रखते रहे।

पांच बार जीते चुनाव, मगर खुद को कभी नहीं दे पाए वोट
मेजर विजय सिंह मनकोटिया के राजनीतिक जीवन की सबसे दिलचस्प बातों में एक यह भी रही कि उन्होंने शाहपुर विधानसभा क्षेत्र से पांच बार चुनाव जीता, लेकिन अपने लिए खुद मतदान नहीं कर पाए।

इसके पीछे वजह भी कम रोचक नहीं थी
उनका पैतृक गांव और घर तियारा में है, जो कांगड़ा विधानसभा क्षेत्र में आता है। जबकि उनकी राजनीतिक कर्मभूमि शाहपुर विधानसभा क्षेत्र रही। ऐसे में चुनाव के दौरान वह शाहपुर से प्रत्याशी होते हुए भी अपने निर्वाचन क्षेत्र में खुद को वोट नहीं दे सकते थे। यानी जिस नेता ने पांच बार शाहपुर की जनता का भरोसा हासिल किया, उसके अपने मत की कहानी ही अलग रही।

निर्दलीय विधायक से मंत्री तक का सफर
मनकोटिया ने राजनीति में अपनी अलग पहचान बनाई। निर्दलीय विधायक के रूप में शुरुआत से लेकर हिमाचल सरकार में मंत्री बनने तक उनका सफर आसान नहीं था। वह दो बार हिमाचल सरकार में मंत्री रहे। सत्ता में रहने के बावजूद उन्होंने अपनी बेबाक शैली को नहीं छोड़ा। उनकी राजनीतिक यात्रा का एक बड़ा अध्याय पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह के साथ उनके टकराव से जुड़ा रहा।

वीरभद्र सिंह से राजनीतिक अदावत बनी चर्चित कहानी
एक समय दोनों नेता एक ही सरकार का हिस्सा रहे, लेकिन बाद में उनके बीच राजनीतिक संबंध बेहद तल्ख हो गए। धीरे-धीरे यह टकराव हिमाचल की सियासत की चर्चित राजनीतिक अदावत में बदल गया। मनकोटिया और वीरभद्र सिंह एक-दूसरे के मुखर राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी बन गए। फिर आया वह दौर, जिसने प्रदेश की राजनीति में भूचाल ला दिया।

पीले पैकेट में आई ऑडियो कैसेट और 'कैसेट कांड'
साल 2007 में मनकोटिया ने एक ऑडियो सीडी सार्वजनिक की। उन्होंने दावा किया कि इसमें वीरभद्र सिंह और उनकी पत्नी प्रतिभा सिंह के बीच कथित वित्तीय लेन-देन को लेकर बातचीत थी। इसके बाद मामला महज राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित नहीं रहा। विवाद जांच और अदालत तक पहुंचा।

मनकोटिया ने अदालत में बताया था कि एक अनजान व्यक्ति ने उन्हें फोन किया था और इसके बाद उनके घर के लेटर बॉक्स में पीले पैकेट में ऑडियो कैसेट मिली थी। यह पूरा घटनाक्रम हिमाचल की राजनीति में लंबे समय तक 'कैसेट कांड' के नाम से चर्चा में रहा।

पूर्व सैनिकों के मुद्दे हमेशा रहे प्राथमिकता में
सैनिक से राजनेता बने मनकोटिया के सार्वजनिक जीवन में पूर्व सैनिकों से जुड़े मुद्दों का भी महत्वपूर्ण स्थान रहा। वह हिमाचल प्रदेश एक्स-सर्विसमैन लीग से लंबे समय तक जुड़े रहे। पूर्व सैनिकों के हितों और उनकी समस्याओं को लेकर उनकी सक्रियता उनके सार्वजनिक जीवन का अहम हिस्सा रही।

राजनीति के साथ लेखन भी किया
मेजर मनकोटिया की रुचि केवल राजनीति तक सीमित नहीं रही। उन्होंने किताबें भी लिखीं। The Patterns of Destiny, Turmoil और Upheaval जैसी उनकी पुस्तकों में उनके सार्वजनिक जीवन, समाज और राजनीति को देखने का नजरिया दिखाई देता है। इन किताबों के जरिए भी उन्होंने अपने अनुभवों और विचारों को सामने रखने की कोशिश की।

सैनिक से मंत्री तक का सफर अब इतिहास
मेजर विजय सिंह मनकोटिया का सफर एक सैनिक से हिमाचल के मंत्री और पांच बार विधायक बनने तक पहुंचा। इस सफर में उपलब्धियां भी रहीं, राजनीतिक संघर्ष भी और विवाद भी। लेकिन इन सबके बीच उनकी एक पहचान लगातार कायम रही बेबाक बोलने वाले नेता की।
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वह राजनीति में रहे तो अपनी शर्तों और अपने अंदाज के साथ। उनके राजनीतिक संघर्ष, वीरभद्र सिंह से टकराव, 'कैसेट कांड', पूर्व सैनिकों के मुद्दे और पांच बार विधायक बनने के बावजूद खुद को वोट न कर पाने की कहानी हिमाचल की सियासत के उन किस्सों में शामिल रहेगी जिन्हें लंबे समय तक याद किया जाएगा। मेजर मनकोटिया का सियासी सफर भले अब थम गया हो, लेकिन उनकी बेबाकी और उनसे जुड़े राजनीतिक किस्से हिमाचल की सियासत के इतिहास में अपनी जगह बनाए रखेंगे।
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