हिमाचल प्रदेश के पालमपुर पारिवारिक न्यायालय ने एक वैवाहिक विवाद में पति के पक्ष में तलाक की डिक्री पारित की है। अदालत ने मामले में पत्नी के कथित व्यवहार को मानसिक क्रूरता की श्रेणी में माना। अदालत के अनुसार, सोशल मीडिया पर अत्यधिक समय बिताना अपने आप में मानसिक क्रूरता नहीं है, लेकिन जब इसके साथ वैवाहिक जिम्मेदारियों से दूरी, लगातार विवाद और जीवनसाथी के प्रति अपमानजनक व्यवहार जुड़ जाए तो परिस्थितियों के आधार पर इसे मानसिक क्रूरता माना जा सकता है।
अतिरिक्त प्रधान न्यायाधीश धीरू ठाकुर की अदालत ने अपने फैसले में व्यक्तिगत स्वतंत्रता और स्वायत्तता के अधिकार को भी महत्वपूर्ण बताया। अदालत ने कहा कि किसी व्यक्ति की सोशल मीडिया गतिविधियों पर केवल इस आधार पर रोक नहीं लगाई जा सकती। हालांकि, यदि सोशल मीडिया का अत्यधिक इस्तेमाल वैवाहिक दायित्वों और रिश्ते पर प्रतिकूल असर डालने लगे तथा उसके साथ लगातार विवाद और तिरस्कारपूर्ण व्यवहार भी हो, तो उसका न्यायिक मूल्यांकन मानसिक क्रूरता के तौर पर किया जा सकता है।
2024 में पति ने दायर की थी तलाक की याचिका
बैजनाथ उपमंडल निवासी पति ने वर्ष 2024 में पारिवारिक न्यायालय में तलाक की याचिका दायर की थी। याचिका में पति ने आरोप लगाया कि मार्च 2017 से पत्नी के व्यवहार में बदलाव आने लगा। उसके अनुसार पत्नी लंबे समय तक सोशल मीडिया पर व्यस्त रहने लगी और ससुराल में रहने तथा घरेलू जिम्मेदारियां निभाने से इन्कार करने लगी।
पति ने यह भी आरोप लगाया कि पत्नी परिवार के सदस्यों और रिश्तेदारों के साथ दुर्व्यवहार करती थी और उसे अनाकर्षक तथा कमतर बताकर लगातार अपमानित करती थी। परिवार और पंचायत स्तर पर रिश्ते में सुधार तथा समझौते के प्रयास किए गए, लेकिन ये प्रयास सफल नहीं हो सके।
नोटिस के बाद भी कोर्ट में पेश नहीं हुई पत्नी
मामले की सुनवाई के दौरान अदालत की ओर से पत्नी को नोटिस जारी किए गए, लेकिन वह अदालत में उपस्थित नहीं हुई। इसके बाद अदालत ने उसे एकतरफा घोषित करते हुए मामले की सुनवाई आगे बढ़ाई और उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर फैसला सुनाया।
कोर्ट ने घरेलू काम से इन्कार पर भी की अहम टिप्पणी
अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल खाना बनाने या कपड़े धोने जैसे घरेलू काम करने से इन्कार करना अपने आप में मानसिक क्रूरता नहीं माना जा सकता। हालांकि, यदि ऐसा व्यवहार विवाह संबंध जारी न रखने की मंशा, लगातार विवाद, परिवार के प्रति अनादर और जीवनसाथी के अपमान जैसे अन्य तथ्यों के साथ सामने आए और आरोपों का प्रभावी खंडन भी न हो, तो पूरे मामले की परिस्थितियों के आधार पर इसे मानसिक क्रूरता माना जा सकता है। अदालत के इस फैसले में सोशल मीडिया के अत्यधिक इस्तेमाल और वैवाहिक दायित्वों के बीच संतुलन को लेकर महत्वपूर्ण कानूनी टिप्पणी सामने आई है।