रावी के तेज बहाव की चपेट में आने से बहे वायुसेना के दोनों जवानों की मौत का राज प्रशासन के साथ-साथ वायु सेना भी जानना चाहती है। ऐसे में प्रशासन को हादसे की जांच की रिपोर्ट वायुसेना को भी सौंपनी होगी। इससे पूर्व वायुसेना के अधिकारी पोस्टमार्टम और पुलिस पड़ताल का पूरा रिकॉर्ड अपने साथ ले गए हैं।
दोनों जवानों के साथियों की मानें तो मरने वाले सैनिक अच्छे तैराक थे और किसी भी हालात में खुद को ढालना जानते थे। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि रावी में पानी का बहाव एक दम से बढ़ा या धीरे-धीरे पानी तेज हुआ। कायदे से पानी छोड़ते वक्त इन सभी सावधानियों को ध्यान में रखा जाना जरूरी है। प्रशासन की जांच में पानी का स्तर भी शामिल है। अब इस संबंध में भी एनएचपीसी प्रबंधन से पूछताछ की जा सकती है। रावी में अमूमन सुबह और शाम को ही पानी छोड़ा जाता है। लेकिन इसके लिए कोई निर्धारित समय नहीं है। हादसे की जांच के कई पहलू शुरूआत में ही प्रशासन के हाथ लग गए हैं।
हादसे के तुरंत बाद मामले के जांच अधिकारी एडीएम चंबा शुभकरण सिंह ने चेतावनी बोर्ड और सायरन का मुआयना कर लिया था लेकिन हादसे वाली जगह तक सायरन की आवाज पहुंचती है या नहीं, इसकी जांच होना अभी बाकी है। इसके साथ ही पानी छोड़ने का समय और पानी का स्तर भी इस जांच की अहम कड़ियां रहेंगी। वायु सेना के अधिकारी भी इस बात को मानते हैं उनके जवानों को विपरीत परिस्थिति में जिंदा रहने के लिए तैयार किया जाता है। ऐसे में उन्होंने सायरन की आवाज नहीं सुनी और रावी के जलस्तर के आगे इतनी जल्दी कैसे हाथ खड़े कर दिए। ऐसे कई सवाल हैं जो वायुसेना के लिए भी पहेली बने हुए हैं। बहरहाल, सोमवार को शिवरात्रि की छुट्टी के चलते इस मामले की जांच में कोई तेजी दिखाई नहीं दी है। जबकि मंगलवार से मामले की जांच में तेजी आने की संभावना जताई जा रही है। मंगलवार को ही इन सभी सवालों के जवाब भी प्रशासन परियोजना प्रबंधन से मांग सकता है।
उपायुक्त सुदेश मोख्टा का कहना है कि प्रशासनिक जांच में पानी का स्तर, समय, सायरन की आवाज, चेतावनी बोर्ड जैसे सभी विषय शामिल हैं। प्रशासन इस पूरे मामले को 15 दिन में खंगाल डालेगा। जिसकी गलती पाई गई उसे किसी भी कीमत पर बख्शा नहीं जाएगा। जांच पूरी होने के बाद इसकी रिपोर्ट की एक कॉपी वायुसेना को भी उपलब्ध करवा दी जाएगी।