बुरी शक्तियों का खात्मा करने के लिए घुमाई जाती है अग्नि मशाल
संवाद न्यूज एजेंसी
चंबा। ऐतिहासिक शहर चंबा में लोहड़ी की आधी रात को रियासत काल से चली आ रही राज मुशहरा (मशाल) की खूब धूम रही। राजमढ़ी सुराड़ा ने 13 मढ़ियों पर अपना आधिपत्य स्थापित किया। मान्यता है कि बुरी शक्तियों के खात्मे के लिए अग्नि मशाल को पूरे शहर के चौराहों में घुमाया जाता है। इस दौरान बड़ी संख्या में मुशहरा में युवाओं ने भाग लिया। शुक्रवार को रात 11:00 बजे राजमढ़ी सुराड़ा से 17 फीट लंबे लकड़ियों से बनाए गए मुशहरे को युवाओं की टोली उठाकर बैंडबाजे के साथ रवाना हुई।
मुशहरे को अपने कंधों पर उठाकर युवा बजीर मढ़ी चौंतड़ा, द्रोबी, बनगोटू, नंद, नर, सपड़ी, झीर, चौगान, बंशी गोपाल, हरनाला, जनसाली, रामगढ़, खरूड़ा आदि मढ़ियों से होकर गुजरे। यहां मुुशहरा ले जा रहे लोगों में छीनाझपटी भी हुई लेकिन इस छीनाझपटी में किसी को कोई चोट नहीं पहुंची। मुशहरा लेकर रात में भ्रमण करने वाली यह परंपरा हर साल निभाई जाती है। इस दौरान पर्याप्त पुलिस बल भी तैनात रहा। पुलिस ने विभिन्न वार्डों में गश्त की और शरारती तत्वों पर नजर रखी। मुशहरा को उठाकर ले जाने वाले युवा भोले के जयकारे लगाते हुए आगे बढ़े। वहीं स्थानीय लोग भी इस मुशहरे की परंपरा को देेखने के लिए अपने घरों की खिड़कियों और छतों पर नजर आए। सुराड़ा निवासी मनोज सिंह ठाकुर, राजेंद्र सिंह जसरोटिया, अधिवक्ता संजीव शर्मा, ओम प्रकाश गुलेरिया, राजिंद्र गुलेरिया, वीरेद्र जरयाल, हितेंद्र गौतम, ओंकार सिंह ठाकुर, लोकेंद्र पुरी, देवेंद्र पुरी, रितिक शर्मा व यशपाल ने बताया कि वर्षों पुरानी परंपरा का निर्वहन कर अपनी संस्कृति अपनी विरासत को लोग संजोए हुए हैं। गौरतलब है कि रियासतकाल में इस घटना के दौरान एक खून माफ रहता था। इसके चलते इसे खूनी लोहड़ी के नाम से भी जाना जाता था। मुशहरे की छीनाझपटी में खून खराबा होना आम बात होती थी। यह लड़ाई-झगड़ा सिर्फ लोहड़ी की रात को ही होता था। बहरहाल बदलते समय के साथ अब यह परंपरा छीनाझपटी तक सीमित रह गई है। हालांकि प्रशासन की ओर से पुलिस की मौजूदगी में राज मुशहरा की परंपरा निभाई जाती है। इसके चलते अब रात में लड़ाई-झगड़े की घटनाएं कम देखने को मिलती हैं। नगर परिषद की ओर से विभिन्न मढ़ियों पर आग जलाने के लिए आर्थिक खर्चा दिया गया।