बरठीं (बिलासपुर)। खैर माफियाओं की विभागीय कर्मचारियों के साथ मिलीभगत सामने आने से विभाग पर सवालिया निशान लग गया है। विभाग के अवैध कटान न होने व खैर माफियाओं के साथ मिलीभगत न होने के दावे खोखले साबित हो चुके हैं जिसका साक्षात प्रमाण गत दिवस रिश्वत खोरी के मामले ने दे दिया है।
उल्लेखनीय है कि गत माह ‘अमर उजाला’ ने कोटधार में हो रहा अवैध खैर कटान के तहत यह मामला उठाया था जिस पर विभाग ने 160 पेड़ों की एवज में मात्र 50 हजार रुपये ठेकेदारों से वसूल कर कटान व मिलीभगत पर पर्दा डालने की कोशिश की थी, लेकिन मंडल बिलासपुर के तहत वन परिक्षेत्र कलोल के पिछड़ा क्षेत्र कोटधार के विभिन्न जंगलों में खैर बिना पंजीकृत किए व अंडर साइज पेड़ों को जोर शोर से काटा जा रहा है। इस कारण जहां पेड़ों की संख्या कम हो रही है वहीं सरकार को भी लाखों रुपये का चूना भी लगाया जा रहा है।
हर वर्ष की भांति चालू वर्ष में भी खैर के कटान का कार्य विभाग की ओर से ठेकेदारों के माध्यम से किया जाता है जो वर्तमान में नवंबर 18 में शुरू किया गया है।
पिछड़ा क्षेत्र कोटधार के वन परिक्षेत्र कलोल के वन खंड कलोल, मल्होट व बछरेटू में वर्तमान में ठेेकेदारों द्वारा अवैध रूप से भी कटान किया जा रहा है। वन क्षेत्र खरली, मलराओं, मरोतन, जेजवीं, धनी, जड्डू, कोट मल्होट, बुहाड़, छंजोटी, चलावा, बल्हचलोग सहित अन्य स्थानों पर अवैध कटान जारी है। दो वन खंडों की आठ वन बीटों में करोड़ों रुपये के खैरों का कारोबार किया जा रहा है जिसकी आड़ में विभाग की मिलीभगत से ठेकेदार बिना साइज व बिना डिमारकेशन के खैरों को भी जड़ पटान कर मोटा मुनाफा कमाने में जुटे हुए हैं। वन काटुए खैर के पेड़ों को विभागीय अधिकारियों व कर्मचारियों की कथित मिलीभगत से रातों रात ट्रकों में भरकर बेखौफ प्रदेश की सीमा के साथ लगते बाहरी राज्यों में ले जा रहे हैं।
फिल्हाल खैर माफिया विभाग की सुस्ती के कारण अपने मंसूबों में कामयाब होते नजर आ रहे हैं। इसकी जांच करने पर पता चलेगा कि विभागीय सुस्ती व ठेकेदारों की चालाकी की वजह से करोड़ों रुपये की वन संपदा काटी जा चुकी है। कुछ लोगों का कहना है कि यदि बाड़ ही खेत को खाने का प्रयास करे तो वन संपदा को कौन बचाएगा।
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