जिले में पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए अपार संभावनाएं हैं लेकिन दुर्भाग्यवश आज तक किसी भी सरकार ने इस ओर गंभीरता से ध्यान नहीं दिया। इस क्षेत्र की सांसद रही कुमारी सैलजा केंद्र सरकार में केंद्रीय पर्यटन मंत्री रहीं। उन्होंने अपने कार्यकाल में क्षेत्र को पर्यटन की दृष्टि से विकसित करने का भरसक प्रयास किया, लेकिन सफल नहीं हो पाईं।
स्थानीय लोग इसके लिए कुमारी सैलजा और उस समय मुख्यमंत्री रहे भूपेंद्र हुड्डा के बीच मनमुटाव को बड़ी वजह मानते हैं। मौजूदा प्रदेश सरकार ने सरस्वती हैरिटेज बोर्ड के माध्यम से जिले को पर्यटन स्थल के रूप में विकसित किए जाने की घोषणा तो की है, लेकिन इस दिशा में फिलहाल नाममात्र की ही प्रगति हुई है।
मत्स्य पुराण में कपालमोचन को संसार मोचन की संज्ञा दी गई है। इस स्थल से कई जनश्रुतियां जुड़ी हैं। अत्याचारी ब्राह्मण की हत्या करने वाले गाय व बछड़ेे की जोड़ी कपालमोचन सरोवर में स्नान करने से दोष मुक्त हो गई थी। सरोवर के पश्चिमी घाट पर गाय एवं बछड़े की मूर्तियां आज भी स्थापित हैं।
भरत ने इस स्थान पर आकर भगवान राम की मूर्ति प्रतिष्ठित की थी। पांडवों ने महाभारत के युद्ध के बाद अपने सगे-संबंधियों एवं गुरु द्रोणाचार्य की हत्या के बाद आत्मिक शांति के लिए यहां के ऋण मोचन सरोवर में स्नान किया था। गुरु गोबिंद सिंह ने अपने शस्त्र यहां स्थित सरोवर के घाट पर धोए थे।
कपालमोचन में हर साल कार्तिक पूर्णिमा को मेला लगता है, जिसमें पंजाब, हरियाणा व उत्तरप्रदेश के लाखों श्रद्धालु आते हैं। इस मेले को प्रदेश सरकार ने सरकारी मेला घोषित किया हुआ है और जिला प्रशासन की ओर से मेले में हर प्रकार की सुविधाएं दी जाती हैं।
इस क्षेत्र को करीब तीन साल पहले श्राइन बोर्ड के अधीन कर दिया गया। इसके बावजूद यह तीर्थ स्थल बदहाल है। जिला प्रशासन सिर्फ मेले के दिनों में इस स्थल की सुध लेता है। यहां के ऋणमोचन व कपालमोचन सरोवर में साल के अन्य महीनों में पानी ही नहीं होता है। सरोवर में लंबी घास उगी रहती है और जहरीले जीव-जंतु घूमते रहते हैं।
कपालमोचन क्षेत्र में गुरु गोबिंद सिंह मार्शल आर्ट म्यूजियम स्थापित किया गया है। म्यूजियम के लिए एनडीए सरकार के शासन में करीब तीन करोड़ रुपये दिए गए थे लेकिन आज तक इस म्यूजियम को आबाद नहीं किया जा सका है। म्यूजियम में सिख गुरुओं से जुड़े शस्त्रों व वस्तुओं को यहां लोगों के दर्शन के लिए रखने की योजना बनाई गई थी, जो आज तक सिरे नहीं चढ़ पाई है।
वर्तमान में यह म्यूजियम पुरातत्व विभाग के अधीन है। हालत है कि विभाग मेले के दिनों में समय पर इसकी पुताई तक नहीं करवा पाता है। एसजीपीसी सदस्य बलदेव सिंह कायमपुर का कहना है कि म्यूजियम के लिए जितनी राशि आई थी, उसे आज तक यहां लगाया नहीं गया है। यदि म्यूजियम को आबाद कर दिया जाए तो मेले के अलावा साल भर सिख श्रद्धालु यहां आएंगे और यह पर्यटन क्षेत्र के रूप में विकसित हो सकेगा।
बाबा बंदा सिंह बहादुर ने युद्ध की दृष्टि से सुरक्षित लोहगढ़ के किले को सिखों की पहली राजधानी बनाया था। बाबा बंदा सिंह ने यहां गुरु नानक देव व गुरु गोबिंद सिंह के नाम का सिक्का जारी किया था। हरियाणा-हिमाचल प्रदेश की सीमा पर पहाड़ियों में स्थित इस किले के अब अवशेष ही बचे हैं।
किले से नीचे गुरुद्वारा साहिब है। पहाड़ी पर स्थित किले को देखने के लिए यहां हर साल हजारों श्रद्धालु पहुंचते हैं। गुरुद्वारा साहिब और किले तक पहुंचने के लिए कोई सड़क नहीं है। श्रद्धालुओं को सूखी नदी पार कर यहां तक पहुंचना पड़ता है। एसजीपीसी सदस्य बलदेव सिंह ने बताया कि इस क्षेत्र को नया रूप देने और विकास के लिए एसजीपीसी की ओर से पूरा प्लान तैयार किया जा चुका है। पहले चरण में लगभग 15 करोड़ रुपये की राशि से कार्य आरंभ किया जाएगा। हालांकि प्रदेश सरकार और जिला प्रशासन की ओर से आज तक इस महत्वपूर्ण क्षेत्र की सुध नहीं ली गई है।