जैन धर्म की प्रथा संथारा/संलेखना पर नौ साल की सुनवाई के बाद राजस्थान हाईकोर्ट ने संथारा प्रथा को आत्महत्या घोषित कर दिया है। इस फैसले से इससे जैन समाज के लोग भड़क गए हैं।
विरोध में जिले के सकल जैन समाज की चारों आमनाओं दिगंबर, स्वेतांबर, तेरापंथी व स्थानकवासी सड़क पर उतर आए और नेशनल हाईवे पर रोष मार्च निकालते के बाद जैनियों ने लघु सचिवालय में रोष प्रकट किया। एसडीएम प्रेमचंद को प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति के नाम ज्ञापन सौंपा। इसमें जैन धर्म की इस प्रथा को पहले की तरह चलने देने की मांग की।
जैन समाज की समस्त संस्थाओं के पदाधिकारी और जैन अनुयायी सोमवार सुबह कन्हैया साहिब चौक के नजदीक एकत्रित हुए। यहां से सभी विरोध प्रदर्शन करते हुए चंडीगढ़-रुड़की नेशनल हाईवे 73 पर उतर आए। रोष मार्च निकालते हुए लघु सचिवालय की तरफ रवाना हुए।
प्रदर्शन में जैन समाज के पुरुष वर्ग के साथ महिलाओं व बच्चों ने हाथों पर काली पट्टी बांध कर भारी संख्या में भाग लिया। गाबा अस्पताल, पंचायत भवन, डीसी कैंप ऑफिस, जगाधरी अनाज मंडी गेट से होते हुए जैन अनुयायियों का जुलूस लघु सचिवालय में पहुंचा। यहां कोर्ट के फैसले का विरोध किया।
जीवन का त्याग करना है संथारा
जैन समाज के लोगों ने बताया कि जैन दर्शन के अनुसार संलेखना का अर्थ है पूर्ण गरिमा के साथ अपने जीवन का त्याग करना। इसमें किसी भी प्रकार से आत्महत्या का अंग नहीं है। उन्होंने बताया कि संलेखना धारण करने वाला संत धीरे-धीरे अन्न-पानी ग्रहण करना कम कर अपने मस्तिष्क एवं आत्मा को शुद्ध बनाते हुए जीवन के शाश्वत सत्य मृत्यु को ग्रहण करता है।
संस्थान बंद कर प्रदर्शन में शामिल हुए जैनी
जैन समाज के सभी सदस्यों ने आकस्मिक सेवाओं को छोड़ अपने संस्थान बंद रखे। संस्थाओं के पदाधिकारियों ने बताया कि हाईकोर्ट के इस फैसले से संपूर्ण भारत के जैन अनुयायियों में रोष है। यमुनानगर की तरह पूरे भारत में जैन समाज के लोगों ने अपनी आकस्मिक सेवाओं को छोड़कर और संस्थान बंद कर विरोध प्रदर्शन किया।