रॉकी का शव जब उसके घर पर पहुंचा तो उसके मां-बाप, बहन और भाई दहाड़े मार-मारकर रो पड़े। रिश्तेदारों के भी आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे। मां अंग्रेजो देवी तो रह-रहकर गुमसुम हो जाती। पिता प्रीतपाल ने जब ताबूत में रखे बेटे का मुुुंह देखा तो फफक कर रो पड़े।
रॉकी के साथ काफी समय गुजार चुके उसके साथी भी खुद को रोने से नहीं रोक पाए। रॉकी की बुआ का भी रो-रोकर बुरा हाल हो गया। वह बार-बार यही कह रही थी कि रॉकी मैंने तो तेरे लिए लड़की देखी थी। तू हमें छोड़कर क्यों चला गया। शहीद रॉकी के घर में आई हर महिला रोती नजर आई। वहीं पुरुष भी रह-रहकर आंसू पोंछते रहे। गांव के लोगों को इस बात का गर्व है कि रॉकी ने अपनी शहादत देकर उनके गांव का नाम देश भर में ऊंचा कर दिया।
‘मैं यहां ऐके-47 के सहारे जीता हूं...’ रॉकी ने फेसबुक पर किया था कमेंट
शहीद रॉकी के साथी अमरपाल और विक्की ने बताया कि रॉकी ड्यूटी के दौरान अपने दोस्तों को फेसबुक पर कमेंट भेजता रहता था। कुछ दिन पहले ही उसने कमेंट किया था कि ‘मैं यहां ऐके-47 के सहारे जीता हूं।’ विक्की ने बताया कि रॉकी ने बताया था कि कुछ दिन पहले वह अमरनाथ यात्रा के रूट पर तैनात था। उस दौरान भी आतंकवादियों के साथ गोलाबारी हुई थी, लेकिन इसमें कोई घायल नहीं हुआ था। रॉकी रात को अकसर फोन पर फेसबुक के जरिये अपने दोस्तों को कमेंट भेजता रहता था।
भाई की भी देश के दुश्मनों से लड़ने की तमन्ना
रॉकी का बड़ा भाई रोहित भी बीएसएफ में भर्ती होना चाहता है। इसके लिए उसने फिजिकल टेस्ट भी दिया है। रॉकी की शहादत के बाद भी रोहित बीएसएफ में भर्ती होने के अपने फैसले पर अडिग है। उसका कहना है कि वह भी देश के दुश्मनों को मुंहतोड़ जवाब देना चाहता है, लेकिन बीएसएफ में भर्ती के बारे में उसके माता-पिता जो भी फैसला करेंगे, वह उसे मानेगा।
मंत्री जी स्टेडियम बना दो, हम भी सेना में भर्ती होंगे
विधानसभा अध्यक्ष कंवर पाल व राज्यमंत्री कर्णदेव कांबोज के समक्ष ग्रामीणों और युवाओं ने गांव में स्टेडियम बनाने की मांग रखी। युवाओं ने कहा कि गांव के युवा सेना में भर्ती होना चाहते हैं। इसके लिए रोज गांव की सड़कों पर दौड़ लगाते हैं। गांव में स्टेडियम बन जाएगा तो गांव के युवाओं के लिए सेना में भर्ती की राह आसान हो जाएगी। दोनों नेताओं ने स्टेडियम बनवाने व रॉकी के सम्मान में स्मारक अथवा ग्रामीणों की मांग पर कोई अन्य यादगार बनाने का आश्वासन दिया। उन्होंने गांव के स्कूल व गांव की सड़क का नाम शहीद रॉकी के नाम पर रखने का विश्वास दिलाया। वहीं अंतिम संस्कार में आए बार्डर सिक्योरिटी फोर्स के डीआईजी केके गुलिया ने भी परिजनों को विश्वास दिलाया है कि योग्यता के आधार पर सैनिक रॉकी के परिवार के किसी सदस्य को नौकरी दिलाने का प्रयास किया जाएगा।
‘विधायक जी, वोट मांगने के लिए आप रात के 12 बजे भी आते हैं, मगर दुख की घड़ी में आने की जरूरत नहीं समझी’
शहीद रॉकी के परिजन और ग्रामीणों में इस बात का रोष है कि रॉकी के शहीद होने का पता चलने के तीन दिन बाद तक किसी भी मंत्री या विधायक ने घर आकर परिवार को सांत्वना नहीं दी। लोग स्थानीय विधायक बलवंत सिंह से खासे नाराज दिखे। अंतिम संस्कार से कुछ समय पूर्व शहीद के घर आए विधायक बलवंत सिंह को लोगों के गुस्से का सामना करना पड़ा। परिजनों और ग्रामीणों ने कहा ‘विधायक जी आपका गांव हमारे गांव से एक किलोमीटर दूर है। वोट मांगने के लिए आप रात को 12 बजे तक गांव में आते रहे, लेकिन दुख की घड़ी में आपने यहां आने की जरूरत नहीं समझी।