नोटबंदी को 50 दिन पूरे हो गए है। लेकिन बाजार में नोटों की गर्मी नदारद है। लोगों की जेंबों में जरूरी खर्चाें के लिए भी नोट नहीं है। इसका असर बाजार पर पड़ रहा है। इसकी किल्लत से निपटने के लिए कैशलैस प्रणाली का जोर-शोर से प्रचार किया जा रहा है। दुकानदार भले ही जागरूक हो रहे हैं, लेकिन ग्राहकों फिलहाल इसे स्वीकार नहीं कर पाए हैं। वहीं बैंकों से स्वाइप मशीनें न मिलने से कैशलैस सिस्टम धरातल पर नहीं उतर पाया है।
-गौरव बढेरा कैंप में करियाना के थोक विक्रेता है। साथ ही रिटेलर भी है। नोटबंदी के बाद धंधे में आई मंदी के चलते इन्होंने पेटीएम से पेमेंट लेना शुरू कर दिया। इसके बावजूद ग्राहक कम आ रहे हैं। गौरव ने बताया कि सभी ग्राहकों के पास पेटीएम नहीं होता। स्वाइप मशीन के लिए अप्लाई किया है, लेकिन अभी तक मिला नहीं है। उधर, बैंकों से लोगों को पर्याप्त नोट नहीं मिल पा रहे हैं। इसका असर दुकानदारी पर पड़ रहा है। उनके अनुसार नोटबंदी के बाद से करीब 50 प्रतिशत व्यापार कम हो गया है।
-संजय मित्तल का रेडीमेड गारमेंटस का बिजनेस है। नोटबंदी के बाद इन्होंने अपने बैंक में स्वाइप मशीन के लिए अप्लाई कर दिया, लेकिन अब तक स्वाइप मशीन नहीं मिल पाई है। संजय का मानना है कि बैंक स्वाइप मशीन उपलब्ध नहीं करवा पा रहे है। बिना स्वाइप मशीनों के कैशलैस प्रणाली को बढावा कैसे मिलेगा।
नहीं लौटी बर्तन उद्योग की चमक-
-कैश की कमी से नहीं आ रहे आर्डर-
-नहीं हो पा रही लेबर व कच्चे माल की पेमेंट-
नोटबंदी के बाद से जगाधरी के बर्तन उद्योग की चमक धूमिल पड़ गई थी, जो कि अब तक नहीं लौट पाई है। बर्तन निर्माताओं के अनुसार एक तरफ बाजार से आर्डर कम हो गए हैं। वहीं बैंक से पर्याप्त कैश न मिल पाने से लेबर व रॉ मैटेरियल की पेमेंट करना मुश्किल हो रहा है। इससे बर्तनों का उत्पादन प्रभावित हो रहा है। जगाधरी में बर्तन बनाने की 400 से अधिक फैक्ट्रियां हैं। इनमें साल भर बर्तनों का उत्पादन होता रहता है। लेकिन नोटबंदी के बाद से इन फैक्ट्रियों में उत्पादन 40 से 60 प्रतिशत तक कम हो गया है।
-बर्तन निर्माता अमरजीत सिंह नेे बताया कि नोटबंदी के बाद भी बैंकों से जरूरत के अनुसार नोट नहीं मिल पा रहे हैं। बैंक से प्रति सप्ताह जितनी रकम निकालते हैं, उससे फैक्ट्री का खर्चा नहीं चल पा रहा है। बैंक से जितनी रकम मिलती है, उससे फैक्टरी की लेबर की ही पेमेंट हो पा रही है। कच्चा माल भी कैश पेमेंट पर ही मिल रहा है। ऐसे में फैक्ट्री में बर्तनों का उत्पादन काफी कम हो गया है।
-सेनेटरी आईटम बनाने वाले राकेश शर्मा ने बताया कि नोटबंदी के बाद से आर्डर काफी कम हो गए हैं। मार्केट में काफी पेमेंट फंसी है। माल खरीदने वालों के पास भी कैश नहीं आ रहा है इसलिए पेमेंट नहीं कर पा रहे हैं। फैक्ट्री में लेबर को तो पैसे चाहिए इसलिए अब आधे लेबर से ही काम करवा रहे है।
नोटबंदी के बाद बर्तन उद्योग काफी अधिक प्रभावित हुआ है। बाजार में कैश न होने से बर्तनों की डिमांड नहीं निकल रही है। ऐसे में बर्तन निर्माताओं को मजबूरन उत्पादन कम करना पड़ रहा है। जो हालात है, उससे लगता है एक जनवरी के बाद भी कैश की किल्लत बनी रहेगी।
सुंदर लाल बतरा, महासचिव, द जगाधरी मैटल मैन्युफैक्चरर्स एंड स्पलायर्स एसोसिशन