एसएस जैन सभा स्थानक में चातुर्मास के दिन जितेंद्र मुनि महाराज के सानिध्य में रचित मुनि महाराज ने उत्तम क्षमा धर्म पर प्रवचन दिए। उन्होंने कहा कि दिगंबर परंपरा में 10 धर्मों की चर्चा आती है। 10 धर्मों की उपासना जैन श्रावक दस दिन करते हैं। इनमें उत्तम क्षमा, उत्तम मार्दव, उत्तम आर्जव, उत्तम शौच, उत्तम सत्य, उत्तम संयम, उत्तम तप, उत्तम त्याग, उत्तम आकिंचन, एवं उत्तम ब्रह्मचर्य शामिल है। इन्हें दस लक्षण धर्म भी कहा जाता है। उन्होंने कहा कि सभी धर्मों में त्योहार मनाने के तरीके भले ही अलग है लेकिन मंजिल एक है।
उन्होंने कहा कि हर धर्म में मैत्री भाव को मनाने के अपने-अपने तौर तरीके होते हैं। जैसे सनातन वैदिक धर्म में होली मिलन त्योहार है। इसमें हम दिल के गंदे ख्यालों को छोड़कर गले मिलते हैं। चेहरा भी गंदा, कपड़े भी गंदे, लेकिन मन गंदा नहीं होता उसको होली मिलन कहते हैं। मुसलमान ईद मनाते हैं। जिसे हम मीठी ईद कहते हैं। ईसाइयों के अंदर अप्रैल डे मनाया जाता है। आपस की रंजीस, वैरभाव भुला कर गले लगा कर दूर करते हैं। इसी प्रकार जैन धर्म में भी उत्तम क्षमा, क्षमावाणी धर्म मनाया जाता है। ये धर्म दूरियां मिटाने का और नजदीकियां बढ़ाने का है। आराधना का प्रथम दिन उत्तम क्षमा पर्युषण महापर्व का पहला दिन उत्तम क्षमा का दिन होता है। आपने देखा कि क्षमा में ही मां छिपी है। जिस प्रकार एक मां क्षमाशील होती है, उसी प्रकार धर्म के प्रमुख दस लक्षणों में उत्तम क्षमा की शक्ति अनंत और अतुल्य है। क्षमा ही सब तपस्याओं का मूल है। ईसा मसीहा बहुत दयालु थे। उन्होंने अपने जीवन में कभी क्रोध नहीं किया। इस दुनिया में ऐसे भी प्राणी हैं जो प्राण जाने पर भी अपराधी पर क्रोध नहीं करते। उन्होंने कहा कि जब व्यक्ति क्षमा को अपने जीवन का आधार बना लेता है, तो उसके संपर्क में आने वाला अपने वैरभाव को छोड़ देता है।