हथिनी कुंड बैराज पर इन दिनों पानी का संकट लगातार गहराता जा रहा है। यमुना नदी का जलस्तर दिन-प्रतिदिन घट रहा है, जिससे पनबिजली परियोजनाओं, सिंचाई व्यवस्था और यमुना से जुड़े क्षेत्रों पर सीधा असर पड़ने की आशंका बढ़ गई है। फिलहाल बैराज में जो पानी पहुंच रहा है, वह केवल पहाड़ी क्षेत्रों में पिघल रही बर्फ से मिलने वाला पानी है। विभागीय अधिकारियों का कहना है कि आने वाले दिनों में यदि हालात ऐसे ही रहे तो परेशानी और बढ़ सकती है। वहीं, लंबे समय से बारिश भी नहीं हुई है।
सर्दियों में पहाड़ों से सीमित मात्रा में आता है पानी
हथिनी कुंड बैराज के आसपास कोई बड़ा डैम या जल भंडारण संरचना नहीं है, जहां बरसात या पहाड़ों से आने वाले पानी को संग्रहित किया जा सके। इसी वजह से सर्दियों के मौसम में, जब बारिश लगभग न के बराबर होती है और पहाड़ों से भी सीमित मात्रा में ही पानी मिलता है, तब यमुना का प्रवाह काफी कम हो जाता है। वर्तमान में बैराज का संचालन पूरी तरह से बर्फ पिघलने से मिलने वाले पानी पर निर्भर है। इस कारण पनबिजली परियोजनाओं को भी सीमित क्षमता पर चलाया जा रहा है।
जल प्रबंधन योजनाओं पर पड़ सकता है असर
बैराज कार्यालय के गेज रीडर मनीष कुमार के अनुसार शनिवार को जल प्रवाह में लगातार उतार-चढ़ाव दर्ज किया गया। सुबह 7 बजे बैराज पर 2187 क्यूसेक पानी दर्ज किया गया, जो 8 बजे घटकर 2123 क्यूसेक रह गया। 9 बजे जल प्रवाह बढ़कर 2985 क्यूसेक, 10 बजे 3579 क्यूसेक और दोपहर 12 बजे 4002 क्यूसेक तक पहुंच गया।
इसके बाद दोपहर 1 बजे यह घटकर 2768 क्यूसेक, 2 बजे 2305 क्यूसेक, 3 बजे 2282 क्यूसेक, 4 बजे 2305 क्यूसेक और शाम 5 बजे 2258 क्यूसेक दर्ज किया गया। उपलब्ध पानी में से पश्चिमी यमुना नहर को 1720 क्यूसेक, यमुना नदी में 352 क्यूसेक और उत्तर प्रदेश की ओर 186 क्यूसेक पानी छोड़ा गया। इन आंकड़ों से साफ है कि बैराज पर जल उपलब्धता स्थिर नहीं है, जिसका असर भविष्य की जल प्रबंधन योजनाओं पर पड़ सकता है।
सर्दी के मौसम में हर वर्ष हथिनी कुंड बैराज पर पानी की कमी देखने को मिलती है। यह एक मौसमी समस्या है। उन्होंने कहा कि मार्च-अप्रैल के बाद तापमान बढ़ने पर पहाड़ों पर जमी बर्फ तेजी से पिघलती है, जिससे यमुना में जल प्रवाह स्वाभाविक रूप से बढ़ जाता है। फिलहाल पहाड़ों से आने वाला बर्फीला पानी ही यमुना तक पहुंच रहा है। ऐसे में स्थिति चिंताजनक जरूर है, लेकिन असामान्य नहीं मानी जा सकती। -विजय गर्ग, एक्सईएन, सिंचाई विभाग।