संवाद न्यूज एजेंसी
यमुनानगर। शहर में वसंत पंचमी के अवसर पर पतंगबाजों और त्योहार मनाने वालों के बीच रंग-बिरंगी पतंगों की खरीदारी जोरों पर है। बाजार में छोटी-बड़ी, चमकीली और डिजाइनर पतंगों की भरमार है। दुकानदारों के अनुसार इस साल सबसे अधिक मांग 12 इंच से 24 इंच तक की रंगीन पतंगों की है। छोटे आकार की पतंग 15 से 25 रुपये के बीच और बड़े आकार की पतंग 50 से 80 रुपये में बिक रही हैं।
बाजार में नई डिजाइन और चमकीले रंगों की पतंगों ने बच्चों और युवाओं का ध्यान खींचा है। वरिष्ठ पतंगबाजों का कहना है कि पहले मुकाबले मोहल्लों और छतों पर दो-दो पतंगबाजों के बीच होते थे, लेकिन अब बाजार में उपलब्ध रंग-बिरंगी पतंगों ने त्योहार की रौनक को बढ़ा दिया है।
दुकानदार अनिल व कुलबीर सिंह ने बताया, इस साल विशेषकर चमकीले रंग और बड़े आकार की पतंगों की बिक्री में तेजी है। लोग पारंपरिक पतंगों के साथ-साथ नए डिजाइनों की पतंग खरीदना पसंद कर रहे हैं। पतंगबाज भी कह रहे हैं कि बाजार में पतंगों की विविधता बढ़ी है, लेकिन असली मजा तो पुराने अंदाज के मुकाबलों में ही आता था।
चीनी मांझे पर प्रशासन की सख्ती और रेट की बढ़ोतरी
हालांकि रंग-बिरंगी पतंगों के बीच खतरनाक चीनी मांझे ने चिंता बढ़ा दी है। स्थानीय दुकानदारों के अनुसार, 50 ग्राम के पैक में चीनी मांझा इस बार 40 से 50 रुपये में बिक रहा है, जबकि पिछले साल यह 30 से 35 रुपये में उपलब्ध था। पतंगबाजों का कहना है कि चीनी मांझे से गंभीर चोट लगने का खतरा रहता है और पक्षियों की जान भी जोखिम में पड़ती है। इस कारण प्रशासन ने इसे बेचने और इस्तेमाल करने पर कड़ी निगरानी शुरू कर दी है। बावजूद इसके, कुछ लोग प्रतिबंधों के बावजूद इसे खरीद रहे हैं। वरिष्ठ पतंगबाजों ने लोगों से अपील की है कि इस साल वसंत पंचमी पर सूती या कोरडो मांझे का ही उपयोग करें। उनका कहना है कि सुरक्षित मांझा और जिम्मेदारी से पतंगबाजी करने पर ही त्योहार की असली खुशी लौट सकती है।
छतों और मैदानों में होते थे मुकाबले
शहर के पतंगबाज रामनिवास बताते हैं कि पुराने समय में वसंत पंचमी पर पतंगबाजी का मजा ही कुछ और था। मोहल्लों की छतों पर दो-दो पतंगबाज आमने-सामने आते और दिनभर मुकाबले होते। हर टोली की अपनी पहचान होती और हर पतंगबाज अपनी कला दिखाने के लिए तैयार रहता। पुराने समय में कौशल ही जीत तय करता था। मुकाबले में हारने वाले को मिठाई या चाय पिलानी पड़ती थी। उस दौर में सूती मांझा चलता था।
मौसम बदलने की खुशी और दोस्ती का उत्सव
शहर के दलबीर सिंह के अनुसार शहर के मैदानों में भी मुकाबले खूब होते थे। उन्होंने बताया कि लड़ाई केवल पतंगों तक सीमित नहीं रहती, दोस्ती, हंसी और आपसी स्नेह भी मुकाबलों का हिस्सा होता था। दलबीर सिंह कहते हैं कि अब बाजार में नई डिजाइन और रंग-बिरंगी पतंगें बहुत हैं, लेकिन पुराने मुकाबलों की गर्माहट और अपनापन खो गया है। उनका मानना है कि अगर शहर में पुराने अंदाज के मुकाबले फिर से आयोजित किए जाएं, तो वसंत पंचमी की असली रौनक लौट सकती है।