संवाद न्यूज एजेंसी
यमुनानगर। एसएस जैन सभा माडल टाउन के प्रांगण में चल रहे चातुर्मास के 57वें दिन साध्वी डॉ. स्वाति महाराज ने कहा कि श्रीमद् भागवत गीता में श्रीकृष्ण महाराज ने कहा है कि तप तीन प्रकार का होता है, राजसिक, तामसिक और सात्विक तप।
उन्होंने बताया कि जो तप मनोकामना पूर्ण करने के लिए किया जाता है उसे राजसिक तप कहते हैं जो तप किसी को कष्ट देने के लिए किया जाता है या किसी का अहित करने के लिए किया जाता है वह तामसिक तप कहलाता है। जो तप कर्म निर्जरा के लिए और सिर्फ आत्म कल्याण के लिए किया जाता है वह सात्विक तप कहलाता है।
कपड़े को शुद्ध करना हो तो साबुन पानी से धोकर हम कर लेते हैं, लोहा आग में तपकर शुद्ध किया जाता है,सोने को शुद्ध करने के लिए अग्नि में तपाया जाता है।आग में तप कर ही सोना कुंदन बनता है। हर चीज को शुद्ध करने का अलग-अलग तरीका होता है कोई चीज पानी से कोई चीज पेट्रोल से और कोई चीज अग्नि से साफ होती है, ऐसे ही आत्मा की शुद्धि तपस्या से होती है महा साध्वी श्री ने कहा हमें सिर्फ कर्मों की निर्जरा करने के लिए ही तप करना चाहिए।तप के मुख्य रूप से तीन प्रकार होते हैं
शारीरिक तप, यह तप शारीरिक साधनों द्वारा किया जाता है, जैसे कि योग, प्राणायाम, और शारीरिक संयम। मानसिक तप, यह तप मानसिक साधनों द्वारा किया जाता है, जैसे कि ध्यान, एकाग्रता, और मानसिक संयम। आध्यात्मिक तप, यह तप आध्यात्मिक साधनों द्वारा किया जाता है, जैसे कि प्रार्थना, जप, और आध्यात्मिक संयम।
इन तीनों प्रकार के तप का उद्देश्य आत्म-सुधार, आत्म-ज्ञान, और आत्म-विकास होता है। इसके अलावा, तप के और भी कई प्रकार हो सकते हैं, जैसे कि नियमित तप, यह तप नियमित रूप से किया जाता है। अनियमित तप, यह तप अनियमित रूप से किया जाता है। संयम तप, यह तप संयम और आत्मनियंत्रण के माध्यम से किया जाता है।
वैराग्य तप, यह तप वैराग्य और त्याग के माध्यम से किया जाता है। अंत में साध्वी महाराज ने कहा कि गुरुओं की शरण में जाकर, सत्संग का साथ पाकर शुद्ध मन और अंतःकरण से यदि व्यक्ति आत्म कल्याण के लिए तप करता है तो निश्चित रूप से वह मोक्ष की प्राप्ति करता है।