संवाद न्यूज एजेंसी
जगाधरी। दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान आश्रम हनुमान गेट में साप्ताहिक सत्संग साध्वी सरस्वती भारती ने कर्म संस्कारों की विस्तार से व्याख्या की। उन्होंने कहा कि कहा कि प्रत्येक मानव की जीवन यात्रा एवं जीवन में घटने वाली घटना उसके कर्म का परिणाम स्वरूप है।
उन्होंने कहा कि जहां हम सभी अपनी जीवन यात्रा को पूर्ण करने के लिए आए हैं, उसे मृत्युलोक कहा गया है। यह मृत्युलोक कर्म प्रधान है और हमारे द्वारा किया गया प्रत्येक कर्म ही सुख अथवा दुख के फल स्वरूप जीवन में आता है। मन में उठने वाला प्रत्येक विचार, वाणी के द्वारा बोला गया शब्द और ज्ञान इंद्रियों एवं कर्म इंद्रियों के द्वारा किए गए कार्य भी संचित कर्म के रूप में हमारे अवचेतन मन में इकट्ठा होते रहते हैं।
हमसे जाने-अनजाने कोई कर्म हो गया तो उसका फल कब कहां कैसे मिलेगा, यह केवल प्रकृति ही निश्चित करती है।साध्वी ने कहा कि पूर्ण ब्रह्मनिष्ठ गुरु ही हमें कर्म संस्कारों से मुक्त करवा सकते हैं क्योंकि जहां पाप कर्म संस्कार लोहे की बेड़ियां हैं, तो वहीं पुण्य कर्म संस्कार सोने की बेड़ियों जैसे हैं जो हमें इस संसार के बंधन में बांधे रहते हैं।
कर्म संस्कारों से जीवात्मा तभी मुक्त हो सकता है, जब उसके जीवन में ऐसे गुरु का पदार्पण हो जो ब्रह्म ज्ञान के द्वारा आत्म साक्षात्कार करवा कर उसे उसके वास्तविक स्वरूप में प्रतिष्ठित कर दें। गुरु अपने तपोबल के द्वारा शिष्य के कर्म संस्कारों पर कुठाराघात करता है। गुरु सेवा, साधना, सत्संग और सुमिरन के द्वारा साधक के संचित कर्मों का क्षय करता है
। प्रारब्ध, जो एक पके हुए फल की भांति साधक को पीड़ा देने के लिए आता है, उसे गुरु स्वयं अपने ऊपर लेकर कुछ अंश ही अपने शिष्य तक आने देते हैं और भक्ति मार्ग पर दृढ़ कर के अपने साधक को क्रियावान कर्मों का शोधन करने के लिए प्रेरित भी करते हैं। जिससे साधक कर्म संस्कारों से मुक्त होकर इस संसार में विचरण करता है।