यमुनानगर। पंचतीर्थी मेले में एक दशक पहले तक 30 से 35 हजार श्रद्धालु जुटते थे, पर धीरे-धीरे यह संख्या घटकर सात से 10 हजार तक रह गई है। इसकी एक वजह सरकारी स्तर पर इस स्थान व मेले का प्रचार-प्रसार न होना भी है। पहले बुजुर्गों से इस स्थान के बारे में सुन पीढ़ी दर पीढ़ी परिवार आ रहे थे। यह मेला कपालमोचन मेले के तुरंत बाद होने से कपालमोचन आने वाले हरियाणा, पंजाब व अन्य राज्यों के श्रद्धालु भी पंचतीर्थी मेले में आते थे, किंतु कई वर्षों से मेले में स्थानीय श्रद्धालु ही आ रहे हैं, उनमें भी अधिकतर बुजुर्ग हैं। क्योंकि युवा व किशोर इस स्थान के इतिहास व मान्यताओं से अनभिज्ञ हैं। इस बार मेले के श्रद्धालुओं में भी पांच-सात फीसद ही युवा व किशोर वर्ग से हैं।
पंचमी पर सरोवर में स्नान करने वाले श्रद्धालुओं की संख्या कम -
पंचतीर्थी मेला तीन दिन चलता है, जिसके पहले दिन इस बार दो हजार श्रद्धालु आने का अनुमान लगाया गया। दूसरे दिन पंचमी पर यहां बने सरोवर में स्नान का महत्व बताया गया है, जिसे सुन मेले में इसी दिन सबसे अधिक श्रद्धालु पहुंचते हैं। इस बार भी ऐसा हुआ। मेले में बुधवार को करीब तीन हजार श्रद्धालु पहुंचने का अनुमान लगाया गया है, पर उनमें भी इक्का दुक्का श्रद्धालुओं ने सरोवर में स्नान किया, जबकि अधिकतर श्रद्धालुओं ने आचमन कर काम चलाया। साथ ही यहां स्थित प्राचीन श्री राम-कृष्ण मंदिर धाम व पंचमुखी हनुमान मंदिर के दर्शनों के लिए श्रद्धालुओं की कतार लगी रही। यहां प्रसाद चढ़ाकर श्रद्धालुओं ने मन्नतें मांगीं। मंदिर के सामने लगे बेरी के पेड़ पर सुबह से शाम तक श्रद्धालुओं ने परांदा बांध मन्नतें मांगीं। दोनों मंदिरों व बेरी के पेड़ के अलावा श्रद्धालुओं ने सामने बने सरोवर पर दीपदान भी किया।
हरियाणवी सांग, वैरायटी-शो व मौत का कुआं 10 साल से बंद -
श्रद्धालुओं की संख्या कम होने के साथ मेले से जुड़े किस्से व परंपराएं भी छूट रहे हैं। करीब दो दशक तक मेले का आकर्षण रहे हरियाणवी सांग, वैरायटी-शो व मौत का कुआं भी 10 साल से बंद हैं। मेले में पहुंचे बुजुर्ग श्रद्धालुओं में सरोज, बिमला, कुलवंत, रजो देवी ने बताया कि 20 साल से यहां के इतिहास, मान्यताएं सुनकर पंचतीर्थी मेले में आ रहे हैं। यह मेला कपालमोचन मेले के बाद होता है, इसलिए कपालमोचन आने वाले हरियाणा व पंजाब के विभिन्न जिलों से भी पंचतीर्थी मेले में श्रद्धालु आते थे, पर गत 10 साल में मेले में श्रद्धालु कम हुए हैं। पहले मेले के तीन दिनों में 30 से 35 हजार श्रद्धालु पहुंचते थे, पर अब पांच से सात हजार श्रद्धालु रह गए हैं। यह स्थान व मेला ऐतिहासिक है, इसलिए यहां के बारे में नई पीढ़ी को अवगत कराने के लिए सरकारी स्तर पर हरियाणा, पंजाब के सभी जिलों में प्रचार-प्रसार किया जाना चाहिए।
ये हैं मान्यताएं-
अज्ञातवास के दौरान यहां द्रौपदी सहित पांडव ठहरे थे। यहां बना सरोवर पांडवों का बनाया हुआ है। सरोवर में पांडवों ने अस्त्र-शस्त्र धोए थे। द्रौपदी ने यहां स्थिर बेरी के पेड़ पर धागा बांध कर मन्नत मांगी थी। बेरी को दुख भंजन कहा गया। मान्यता है कि बेरी पर परांदा बांध मांगी मन्नत पूरी होती है। इसलिए मेले में हजारों श्रद्धालु खासकर महिलाएं पेड़ पर तीनों दिन परांदा बांध मन्नतें मांगती हैं। मन्नतें पूरी होने पर मेले में आकर परांदा खोल दिया जाता है। सरोवर में स्नान को लेकर मान्यता है कि पांच रविवार को स्नान करने से चर्म रोग दूर होता है।