यमुनानगर।
सरकारी नौकरी मिली भी, परंतु मन नहीं माना। विधाता को कुछ और ही मंजूर था। नौकरी छोड़ने के बाद सरस्वती कॉलोनी की कोमल ने झुग्गी-झोपड़ी में रहने वाले बच्चों में शिक्षा की अलख जलाने की राह चुनी। इस सफर पर वह अकेली ही आगे बढ़ रही हैं। इसमें सफलता मिल भी रही है। बच्चे भीख मांगना छोड़ कर आज हिंदी के अलावा अंग्रेजी में पढ़ाई कर रहे हैं।
सुबह नौ बजे से शुरू हुआ यह सिलसिला शाम चार बजे तक निरंतर चलता है। यहां सरकारी स्कूलों की तरह रविवार को भी छुट्टी नहीं होती है। वर्ष 2013 में स्नातक पास कर चुकी 31 वर्षीय कोमल हमेशा से ही कुछ अलग करना चाहती थी। स्कूल की पढ़ाई करने के बाद वह कॉलेज गईं। वह उन बच्चों के लिए कुछ करना चाहती थीं, जिनका बचपन भीख मांगने व कूड़ा बीनने से शुरू होता है।
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अपनी सारी उम्र में वह किताब को हाथ तक नहीं लगा पाते। इसलिए कॉलेज पूरा होते ही उन्होंने झुग्गी, मलिन बस्ती आदि में जाकर उनके माता-पिता से बात की। वह मान गए तो उनके बच्चाें को वहीं पढ़ाना शुरू कर दिया। जबकि परिवार चाहता था कि कोमल नौकरी करे ताकि उसे एक अच्छा जीवनसाथी मिल सके। कोमल के न चाहने के बावजूद पिता ने उनसे नौकरी के लिए आवेदन करवा दिया।
किस्मत अच्छी थी इसलिए वर्ष 2020 में आयकर विभाग में सहायक ऑडिट ऑफिसर के पद पर नौकरी मिली। परंतु कोमल का मन नौकरी में नहीं लगा। उनका ध्यान उन बच्चों की तरफ जा रहा था जिनकी पढ़ाई उनकी वजह से अधर में छूट गई थी। इसलिए एक महीना होने से पहले ही कोमल ने नौकरी छोड़ दी और अगले ही दिन जरूरतमंद बच्चों को पढ़ाने के लिए उनके बीच पहुंच गई। इसके बाद रेलवे व पीडब्ल्यूडी में भी नौकरी लगी, लेकिन वह ज्वाइन करने नहीं गई।
जिन बच्चों ने कभी पढ़ने के बारे में सोचा ही नहीं था उनके हाथ में किताब देना किसी चुनौती से कम नहीं था। इसलिए सफर की शुरूआत मुश्किलों के साथ हुई। परिजन इस बात के लिए तैयार ही नहीं थे कि उनके बच्चे पढ़ाई करें। क्योंकि परिवार का गुजारा करने में बच्चे भी काफी हद तक हाथ बंटा रहे थे।
इसके लिए शुरूआत में बच्चों को खाने के सामान का लालच दिया गया। फिर धीरे-धीरे अपने पास पैसे से किताबें व पेंसिल खरीद कर दी। शुरूआत खेल से हुई। खेल-खेल में बच्चे पढ़ने लगे। जब दीवार पर लिखा हुआ आज का विचार पढ़कर बच्चे सुनाते हैं तो कोमल को काफी खुशी होती है। संवाद
जिंदगी जीने का आ रहा आनंद : कोमल
कोमल ने बताया कि पिता बालेश गुर्जर व परिवार से प्रेरित होकर उसने जरूरतमंद बच्चों को निशुल्क ट्यूशन पढ़ाना शुरू किया। सरकारी नौकरी में उसका मन नहीं लगा। फिर भी जिंदगी जीने का जो आनंद बच्चों को पढ़ाने में आ रहा है वह कहीं नहीं मिला। बच्चों को पढ़ाने में उसके दोस्त प्रदीप व भावना भी सहयोग कर रहे हैं। बच्चों को पढ़ाने से फुरसत नहीं है इसलिए अभी तक शादी करने का भी विचार मन में नहीं आया। फिर भी शादी भी उसी से करूंगी जो मेरी इंसानों की भलाई के लिए कभी बाध्य नहीं करेगा।