जगाधरी। हनुमान गेट स्थित दिव्य ज्योति जागृति संस्थान आश्रम में साप्ताहिक सत्संग हुआ। सत्संग में आशुतोष महाराज की शिष्या साध्वी भावना भारती ने कहा कि जीवन की वास्तविक सार्थकता केवल सांसारिक उपलब्धियों में नहीं, अपितु वास्तविक स्वरूप की पहचान में निहित है। भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में गुरु का स्थान सर्वोच्च माना गया है।
उन्होंने बताया कि एक ब्रह्मनिष्ठ गुरु का गुणगान करने का सामर्थ्य स्वयं देवताओं में भी नहीं है। चूंकि गुरु अपने तपोबल से शिष्य को अज्ञान के अंधकार से निकालकर आत्मज्ञान के प्रकाश की ओर ले जाने वाली ब्रह्म शक्ति है। मनुष्य बाहरी संसार को जानने व समझने में अपना पूरा जीवन लगा देता है, परंतु अपने भीतर विद्यमान चेतना को जानने का प्रयास बहुत कम करता है। गुरु साधक को ब्रह्मज्ञान में दीक्षित कर अंतर्मुखी यात्रा की दिशा प्रदान करते हैं।
उन्होंने कहा कि मनुष्य के पास भौतिक सुख-सुविधाएं तो बढ़ी हैं, किंतु मन की शांति और आंतरिक संतोष का अभाव दिखाई देता है। इसका कारण मनुष्य अपनी प्रसन्नता का आधार बाहरी परिस्थितियों में खोजता है। जब तक भीतर के वास्तविक आनंद के स्रोत से उसका संबंध स्थापित नहीं होता, तब तक बाहरी उपलब्धियां भी स्थायी संतुष्टि प्रदान नहीं कर सकती हैं।