संवाद न्यूज एजेंसी
यमुनानगर। एसएस जैन सभा मॉडल टाउन के प्रांगण में चल रहे चतुर्मास के 77 वें दिन साध्वी डॉ. स्वाति महाराज ने 27 दिवसीय तीर्थंकर भगवान श्री पार्श्वनाथ के जाप की श्रृंखला में शनिवार का जाप संपन्न करवाया। जाप के बाद उन्होंने भगवान पार्श्वनाथ के मंगल जीवन चरित्र पर प्रकाश डालते हुए सभा में अपने विचार प्रस्तुत किए।
डॉ. स्वाति ने कहा कि भगवान पार्श्वनाथ जब गृहस्थ जीवन में थे तब उनके नगर वाराणसी में एक तपस्वी आया जो पंचाग्नि तप करता था। माता-पिता के साथ पार्श्व कुमार भी तपस्वी को देखने के लिए गए उन्होंने अपने ज्ञान में देखा कि तपस्वी ने जो धुनी रमा रखी है उसमें जलाए जाने वाले लकड़ी में एक नाग-नागिन युगल जल रहा है तो उन्होंने तपस्वी को कहा कि इस लकड़ी में नाग युगल जल रहा है, लेकिन तपस्वी नहीं माना।
उन्होंने कहा कि पार्श्व प्रभु ने वह लकड़ी अपने हाथों से फाड़ कर उसमें से जलता हुआ नाग-नागिन का जोड़ा निकला, दोनों तड़प रहे थे, पार्श्व कुमार ने देखा कि इन्हे बचाया नहीं जा सकता लेकिन तिराया जा सकता है। उन्होंने उन्हें नवकार महामंत्र का पाठ सुनाया और नाग युगल महामंत्र की ध्वनियों में ऐसे रमे की अपने शरीर की पीड़ा को भूल गए और मरकर धरणेन्दृ देव और मां पद्मावती बने। बड़ी हैरानी होती है यह सुनकर की एक सर्प युगल मरकर देवी देवता बन गए क्योंकि वह प्रभु पार्श्वनाथ से जुड़ गए थे जो उनसे जुड़ता है वह ऐसे ही तरक्की और उन्नति प्राप्त करता है।
साध्वी ने सभी श्रावकों से आग्रह किया कि चतुर्मास में निरंतर प्रवचन में आए जप और तपस्या में रम कर अपनी आत्मा के भाव शुद्ध करें और उसे उज्ज्वल निर्मल बनाते हुए मोक्ष प्राप्ति की ओर प्रयासरत हो जाएं तभी हमारा संतों के चरणों में आना और उनकी शरण में जाना सफल हो पाएगा।र