संवाद न्यूज एजेंसी
व्यासपुर। दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान आश्रम में साप्ताहिक सत्संग में साध्वी सुयशा भारती ने साधक के जीवन में ध्यान का महत्व समझाते हुए कहा कि ध्यान केवल आंख मूंद कर बैठने की प्रक्रिया का नाम नहीं है, अपितु ध्यान तो वह क्रांतिकारी पुरुषार्थ है जिसके द्वारा एक साधक अपने मन वचन कर्म को एक करते हुए परमात्म तत्व में स्थित कर लेता है।
साध्वी कहा कि मनुष्य का आध्यात्मिक स्तर उतना ही ऊंचा उठता है जितना उसके ध्यान की गहराई होती है। ध्यान के द्वारा एक साधारण सा मनुष्य भी दैवीय स्वभाव को प्राप्त कर लेता है। ध्यान ऐसा अचूक बाण है जो किसी भी असाध्य लक्ष्य को साध लेने के लिए सक्षम होता है। ध्यान वह औषधि है जिससे आधि, व्याधि, उपाधि के द्वारा उपजे हुए रोग भी समाप्त हो जाते हैं। किंतु प्रश्न यह है कि वह कौन सा ध्यान है जिसके द्वारा सब कुछ सिद्ध हो सकता है।
उन्होंने कहा कि मनुष्य की बुद्धि विचारों में सदा ही उलझी रहती है और जहां हमारी चेतना केंद्रित हो जाए उसी को ध्यान कहा जाता है। जाने अनजाने आज हम सभी ध्यान मग्न है किंतु उस ध्यान का केंद्र या तो संसार के संबंध, धन संपत्ति या अपनी निजी पारिवारिक अथवा सामाजिक समस्याएं है।
जब परमात्मा की कृपा और पूर्व जन्म के पुण्य पुंज के फल स्वरूप ब्रह्मनिष्ठ संत ब्रह्म ज्ञान के द्वारा हमें आत्म साक्षात्कार करवा देते हैं तभी वास्तविक ध्यान घटित होता है। फिर एक साधक निरंतर ध्यान साधना के द्वारा उस परमात्म तत्व से जुड़कर अपनी संपूर्ण चेतना को भृकुटि मध्य केंद्रित करता हुआ बहिर्मुखी मन को अंतर्मुखी कर लेता है। इसके पश्चात साधक ध्यान की गहराई में उतर कर अपने करता भाव से मुक्त हो जाता है, केवल दृष्टि होकर वह संपूर्ण कर्मों का साक्षी बनकर ही सभी कार्य करता है।