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Yamuna Nagar News: सोमवार के शुरू होगा श्रावण माह, बन रहे दुर्लभ संयोग

Tue, 25 Jun 2024 05:53 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, यमुना नगर
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संवाद न्यूज एजेंसी
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जगाधरी। भारतीय सभ्यता व संस्कृति में हर माह का महत्व होता है। हर हिंदी माह की पौराणिक व वैदिक कथा है। वहीं हिंदी माह श्रावण का विशेष महत्व है। इसे साल का सबसे पवित्र माह माना जाता है। श्रावण में भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा की जाती है। वहीं इस साल का श्रावण माह बेहद विशेष होने वाला है। इस बार श्रावण माह ता आरंभ भगवान शिव के दिन सोमवार से हो रहा है।
सनातन मान्यताओं में श्रावण मास का विशेष धार्मिक व आध्यात्मिक महत्व होता है। इसे साल का सबसे पवित्र महीना माना जाता है। इस महीने को श्रावण या सावन मास भी कहते हैं। इस साल का सावन महीना काफी विशेष है। ज्योतिषाचार्य पंडित संजय चतुर्वेदी ने बताया कि यह सावन माह में दो दुलर्भ संयोग बन रहे हैं। पहला श्रावण मास सोमवार से शुरू हो रहा है। दूसरा इस महीने में कुल पांच सोमवार होंगे।
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इसकी शुरुआत ही भगवान शिव के दिन यानी सोमवार से हो रही है, वहीं इस सोमवार को प्रीति आयुष्मान योग के साथ सर्वार्थ सिद्धि योग बन रहा है। ऐसी मान्यता है कि जो इस योग में भगवान शिव की पूजा करता है उसे कई गुना फल की प्राप्त होता है। इस साल का श्रावण मास 21 जुलाई से शुरू होगा और यह 30 दिन का होगा। श्रावण माह का समापन एक महीने बाद 19 अगस्त को होगा।

पावन श्रावण माह में भगवान शिव व मां पार्वती की पूजा का विधान है। पंडित संजय चतुर्वेदी ने बताया कि श्रावण माह में ज्यादातर श्रद्धालु सोमवार का व्रत करते हैं और भगवान शिव की पूजा करते हैं। उन्होंने बताया कि सावन महीने में अविवाहित लड़कियों को हर मंगलवार मंगला गौरी का व्रत करना चाहिए।
मान्यता है कि मंगला गौरी का व्रत करने से मनचाहा वर प्राप्त होता है। वहीं विवाहिताएं भी मंगला गौरी का व्रत करती हैं, इससे उनके दाम्पत्य जीवन में सुख, प्रेम की वृद्धि होती है। वहीं पति की आयु लंबी होती है। सोमवार का व्रत करने से मनचाहा वर की प्राप्ति होती है। श्रावण के दौरान कांवड़ यात्रा का बहुत प्रसिद्ध है।
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ये श्रावण माह का महत्व

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार समुद्र मंथन के समय से रतनों व औषधियों के अलावा हलाहल विष भी निकला था। जिससे त्राहि त्राहि मच गई थी, यह विष इतना घातक था कि संपूर्ण सृष्टि इसकी चपेट में आने से नष्ट हो जाती। जिस पर भगवान शिव ने हलाहल विष का पान कर लिया। भगवान शि ने हलाहल अपने कंड में रख लिया। विष के प्रभाव से उनका कंठ नीला हो गया, जिसके बाद भगवान शिव को नीलकंठ भी कहा जाने लगा। पंडित संजय चतुर्वेदी ने बताया कि इस दौरान सभी देवताओं, असुरों व प्राणियों ने गंगाजल व दूध से भगवान शिव का अभिषेक किया। जिससे उन्हें शीतलता प्राप्त हुई। यही कारण है कि श्रावण माह में भगवान शिव का गंगाजल से अभिषेक किया जाता है।
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