नासा और इसरो के उपग्रहाें ने भी सरस्वती नदी की वास्तविकता पर मुहर लगाई
है। अंतरिक्ष से लिए गए चित्रों के आधार पर सरस्वती नदी के मार्ग पर जमीन
के नीचे जल भंडार का भी पता चल पाया।
उपग्रह से लिए गए चित्र सरस्वती नदी
के अस्तित्व को मानने वाले भू-वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं के लिए संजीवनी
साबित हुए हैं। सरस्वती नदी शोध संस्थान के संस्थापक दर्शन लाल जैन ने
बताया कि अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा के उपग्रह लैंडसेट से करीब 40 वर्ष
पहले लिए गए चित्र से भारत में वैदिक नदी सरस्वती के मार्ग का सच दुनिया के
सामने आया।
इसके बाद अन्य देशों के उपग्रहों से लिए गए चित्रों से सरस्वती
नदी के लंबे बहाव मार्ग का पता चला है। फ्रांस के स्पॉट, यूरोप के
ईआरएस-1/2 और भारत के आईआरसी-आईसी और अन्य उपग्रहों से लिए गए चित्रों का
भू-वैज्ञानियों ने गहरा अध्ययन किया। इसके आधार पर सरस्वती के उद्मग, विकास
और हस की सत्यता प्रमाणित हुई है। प्रसिद्ध भू-वैज्ञानिक प्रो. यशपाल ने
लैंड सेट से लिए उपग्रह चित्रों का अध्ययन करने के बाद 1980 में अपना शोध
पत्र रिमोट सेंसिंग ऑफ द लास्ट सरस्वती रिवर में जलमार्ग का ब्योरा दिया
है।
उनके इस अध्ययन से आधुनिक नदियों के साथ-साथ सरस्वती नदी और उसकी सहायक
नदियों के प्राचीन जल मार्गों के कई प्रमाण मिले हैं।
नासा के उपग्रही चित्रों से ये मिले प्रमाण
सतलुज एक समय में घग्घर (सरस्वती) के प्राचीन सूखे जलमार्ग में मिल जाती थी और इसमें यमुना भी आकर मिलती थी।
-पंजाब में रोपड़ के पास सतलुज नदी पश्चिम की ओर 90 डिग्री के कोण से मुड़ गई, जिसका कारण नदी अचानक नदी का रास्ता बदलना हो सकता है।
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पटियाला के शतराना के समीप पहुंचकर घग्घर की सूखी नहर अचानक बहुत चौड़ी हो
जाती है, जो इस बात का प्रमाण है कि कोई बड़ी सरिता यहां आकर सरस्वती से
मिली।
- एक और जलमार्ग जो दरिया जैसा प्रतीत होता है, सूरतगढ़ के पास घग्घर में मिलता है।
- चंबल के रास्ते बहकर गंगा नदी में मिलने वाली यमुना नदी संभवता: उससे पहले सरस्वती नदी में विलीन हो जाती थी।
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अनूपगढ़ के पास सरस्वती नदी दो जलमार्गों में बंट गई, जो पाकिस्तान के
बहावलपुर जिले के मरोत और बेरीवाला में अचानक समाप्त हो जाती है। संभवत:
सरस्वती नदी यहां से हाकरा और नारा में बहती हुई कच्छ पहुुंच जाती है।
सामने आया थार के सूखे जलमार्गों और नालों का जाल
भू-वैज्ञानिक
एसएस रामासामी और आरपी वर्मा ने इसरो के उपग्रह आईआरसी-आईसी से लिए गए
चित्रों का गहन अध्ययन किया और इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि थार के रेगिस्तान
में विशाल सरस्वती नदी के सूखे हुए प्राचीन जलमार्गों और नालों का जाल बिछा
हुआ है। धीरे-धीरे पानी कम होने के कारण सरस्वती नदी सूखती गई और सरस्वती
नदी की सहायक नदियों ने अपना रास्ता बदल लिया। इसके बाद किसी भूचाल के कारण
इसका अपने स्रोत से नाता टूट गया और यह बरसाती नदी बनकर रह गई।
शोधकर्त्ताओं के मुताबिक सरस्वती नदी के लुप्त हो जाने का यह क्रम ईसा
पूर्व 3000 से आरंभ हो गया और इसका जल झीलों और तालाबों के रूप में बचा
रहा। राजस्थान में डीडवाना और सांभर झीलें इसका उदाहरण हैं। इसके सूखे
विशाल जलमार्ग आज भी घग्घर, हाकरा और नारा के रूप में दिखाई पड़ते हैं।