संवाद न्यूज एजेंसी
यमुनानगर। एसएस जैन सभा माडल टाउन के प्रांगण में चल रहे चातुर्मास के 58 वें दिन चरित्र चूड़ामणि संयम सुमेरु गुरुदेव मायाराम महाराज एवं पूज्य गुरुदेव योगीराज श्री राम जी लाल जी महाराज की पुण्यतिथि मनाई गई। इस उपलक्ष्य में वीर स्तुति का पाठ किया गया।
साध्वी डॉ. स्वामी महाराज ने फरमाया कि शिरोमणि श्री मायाराम महाराज भारत के एक ऐसे दिव्य संत हुए है जो अपने तप, त्याग, संयम, साधना आदि विशिष्ट गुणों में समस्त भारत में विख्यात हैं। मायाराम का जन्म हरियाणा के बड़ौदा ग्राम में हुआ था। माता-पिता होने का गौरव नंबरदार चहल गोत्रीय जाट चौधरी जोत राम एवं उनकी पत्नी शोभावती को 12 जून 1854 में प्राप्त हुआ। उनके बडे़ भाई आदराम तथा छोटे भाई सुखीराम व रामनाथ थे।
साध्वी स्वाति ने कहा कि मायाराम एक ऐसे बालक थे, जो जन्म होने पर रोये नहीं थे। देह से अत्यधिक सुंदर व मन व्यवहार से अत्यधिक शालीन थे। स्वाभाविक था कि सबका ध्यान इनकी ओर आकर्षित होता। जैन मुनि-दव्य श्री गंगाराम महाराज एवं रतिराम महाराज का पदार्पण बड़ौदा ग्राम में हुआ।
उन्होंने बालक मायाराम को अपने ज्योतिष ज्ञान में देखा। इस बालक में असाधारण व्यक्तित्व इसके भीतर छिपा है। पारखी मुनिव्दय ने बालक मायाराम से परिचय करते हुए शिक्षा हेतु प्रेरित किया। मुनिदव्य ने शिक्षा का दायित्व स्वयं ग्रहण किया। मायाराम अध्ययन व धर्म ध्यान से धीरे-2 निपुण होने लगे। बारह वर्ष की अल्पवय में माता पिता का साया सिर से उठ गया।
चार वर्ष बाद सौलह वर्ष की आयु में मायाराम गांव के नंबरदार बने। विवाह की चर्चा चली तो ज्ञान वैराग्य, शास्त्र भाषा पठित मायाराम ने अस्वीकृति प्रकट की। उनकी जीवन दिशा बदल चुकी थी। एक बार नंबरदार मायाराम एक सरकारी कार्य से पटियाला पंजाब गए। वहां पंजाब मुनि परंपरा के प्रसिद्ध संत हरनाम दास महाराज से उनकी भेंट हुई। उनसे मुनि दीक्षा प्रदान करने की प्रार्थना की। मुनि गंगाराम से अनुमति लेकर मुनि हरनाम ने 28 जनवरी 1877 के दिन दीक्षा प्रदान की।
इनके सात शिष्य बने नानकचंद महाराज, देवीचंद महाराज, छोटा लाल, वुद्धिचंद महाराज, मनोहर लाल महाराज, सुखी राम महाराज, कन्हैयालाल महाराज। युग पुरुष माया राम ने 21 सितंबर 1912 भिवानी हरियाणा में अपना नश्वर शरीर त्याग दिया था। आज उनके लाखों अनुयायी भारत वर्ष में विद्यमान है। आज उनके नाम से अनेक विद्यालय, अस्पताल एवं पुस्तकालय सेवारत है।