साढौरा। नगरपालिका साढौरा को एक बार फिर भंग करके ग्राम पंचायत का दर्जा दिए जाने की मांग हो रही है। यह पहली बार नहीं है जब साढौरा नपा को भंग करके पंचायत का दर्जा देने की बात को रही है। यह रस्साकशी पिछले 24 साल से हो रही है।
अपने-अपने समय में प्रदेश सरकारों ने भी वोटों के फायदे को देखते हुए कभी साढौरा को पंचायत बना दिया तो कभी नगरपालिका का तमगा दे दिया। कभी पंचायत भंग करके नगरपालिका गठित करने तथा बाद में नगरपालिका भंग करके पंचायत का गठन करने का सिलसिला वर्ष 2000 में तत्कालीन ओमप्रकाश चौटाला की सरकार में शुरू हुआ था।
जुलाई 2018 में गठित नगरपालिका को भंग करके पंचायत को बहाल करने के लिए उठ रही मांग के मद्देनजर यह सिलसिला फिर से जारी रह सकता है। 1995 में नगरपालिका के चेयरमैन चुने गए प्रेम भसीन ने बताया कि उनका पूर्व मुख्यमंत्री भजन लाल का कट्टर समर्थक होना तत्कालीन मुख्यमंत्री ओमप्रकाश चौटाला को रास नहीं आ रहा था। यही कारण रहा कि उनके विरोधियों ने वर्ष 2000 में नगरपालिका भंग करवा कर पंचायत का गठन कर दिया था।
इसके बाद अगस्त 2002 में हुए पंचायत के पहले चुनावों में राजकुमार राणा कस्बा की पंचायत के पहले सरपंच चुने गए थे। अप्रैल 2006 में मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा की सरकार ने इस निर्णय को पलटते हुए पंचायत को भंग करके फिर से नगरपालिका का गठन कर दिया। इसके विरोध में कस्बा में आंदोलन शुरु हो गया। पंचायत बहाली की मांग को लेकर कस्बावासियों ने राजनेताओं व अधिकारियों को मांगपत्र देने के अलावा बाजार तक बंद करवाया।
इसके बाद भी हुड्डा सरकार अपने निर्णय पर अडिग रही और विरोध के बावजूद फरवरी 2007 में नगरपालिका चुनावों की प्रक्रिया शुरु कर दी गई। दो मार्च 2007 को होने वाले नगरपालिका चुनावों के लिए नामांकन पत्र दायर करने की प्रक्रिया शुरु हो गई थी। इसी दौरान 28 फरवरी को आए आदेशों के अनुसार नगरपालिका चुनाव रद्द करके पंचायत बहाल कर दी गई।
मार्च 2008 में पंचायत चुनावों में कुलवंत कौर पहली महिला सरपंच चुनी गई। जुलाई 2013 में हुए पंचायत चुनावों में शीला देवी सैनी सरपंच चुनी गई। उनके कार्यकाल के अंतिम वर्ष से ही पंचायत को भंग करके नगरपालिका गठित करने के सुर उठने लगे। पंचायत भंग करके नगरपालिका गठित करने का प्रस्ताव पारित करने बारे सरपंच शीला देवी सैनी व सारे पंचों पर भी दबाव बनाया गया।
पंचायत ने दबाव को न सहते हुए नगरपालिका गठित करने के बजाय पंचायत ही कायम रखने का प्रस्ताव पारित किया। जुलाई 2018 में पंचायत का कार्यकाल पूरा होने के बाद बीडीपीओ प्रशासक नियुक्त हुए तो नगरपालिका बहाल करने का खेल शुरू हो गया। नगरपालिका के पक्षधर चाहते थे कि कस्बा के आधुनिक तर्ज पर विकास के लिए यहां नगरपालिका गठित किया जाना बहुत जरूरी है।
आखिरकार जुलाई 2018 में पंचायत को भंग करके नगरपालिका को बहाल करने की अधिसूचना जारी हो गई। तब भी एक वर्ग ने पंचायत को भंग करने का विरोध किया, लेकिन मनोहर सरकार ने इस विरोध को दरकिनार कर दिया। तब से लेकर जून 2022 तक चार साल के दौरान अधिकारियों ने ही नगरपालिका का शासन संभाला। आखिरकार जून 2022 में हुए नगरपालिका चुनाव में शालिनी शर्मा पहली महिला चेयरपर्सन चुनी गई। संवाद
कम समय में ज्यादा काम कराए : शालिनी
नगरपालिका चेयरपर्सन शालिनी शर्मा ने बताया कि दो साल के अल्पकाल में ही कस्बा के सभी वार्डों में बेतहाशा समान विकास कार्य हुए हैं। सफाई टैक्स खत्म कर दिया गया है, वहीं प्रॉपर्टी भी मामूली दरों से वसूला जा रहा है। स्टेडियम या फिर तोरांवाला व गगड़वाला सरोवरों का जीर्णोद्धार व्यवस्थित तरीके से किया जा रहा है। नगरपालिका के प्रयास से ही अस्पताल के नए भवन का निर्माण शुरु होने वाला है। फिर से पंचायत बहाली की मांग उठने लगी है।
टैक्स का बोझ नहीं चाहते लोग : राजू सैनी
पंचायत बहाली के लिए गठित युवा पंचायत संघर्ष समिति के अध्यक्ष राजू सैनी ने बताया कि कस्बा में अधिकतर लोग किसान या मजदूर वर्ग के हैं। नगरपालिका शासन के दौरान अफसरशाही, कई तरह के नाजायज करों के बोझ, पोर्टल राज व असुविधाओं के कारण अधिकतर कस्बा वासी नगरपालिका शासन से मुक्ति चाहने लगे हैं।