फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

रामलीला : 75 साल से परंपरा की अद्भुत दास्तां

Tue, 13 Oct 2026 01:23 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, यमुना नगर
विज्ञापन
रामलीला मंचन के दौरान भगवान ​श्रीराम की आरती करते अति​थि। कमेटी - फोटो : 1
विज्ञापन
संवाद न्यूज एजेंसी
विज्ञापन

जगाधरी। जब संसाधनों का नामो-निशान तक नहीं होता था, तब दिलों की रोशनी और आस्था के बल पर एक अनूठा सफर शुरू हुआ था। बात जिले की सबसे पुरानी और बड़ी रामलीला की है। 75 वर्ष पहले श्री यमुना रामलीला कमेटी ने रेलवे स्टेशन के पास पुरानी सब्जी मंडी स्थित कैटल कंपाउंड से रामलीला मंचन की शुरुआत की थी। रामलीला का यह मंच अपने 75 गौरवशाली वर्ष पूरे कर चुका है।
आज भले ही आधुनिक कॉलर माइक, भव्य मंच और चमचमाती लाइटिंग ने इसे एक नया रूप दे दिया हो, लेकिन इस माटी से जुड़े बुजुर्गों को आज भी वह दौर याद है, जब कला के प्रति समर्पण ही इसका सबसे बड़ा साधन हुआ करता था। कमेटी के प्रधान अजय गोयल बताते हैं कि आज जब हर चरित्र के लिए डिजाइनर और आधुनिक पोशाकें उपलब्ध हैं।
विज्ञापन

उस शुरुआती दौर की कल्पना करना भी कठिन है। साढ़े सात दशक पहले जब मंच सजता था, तो पात्रों के शृंगार के लिए घरों से चुन्नियां और साड़ियां मंगाई जाती थीं। उन्हीं के सहारे कलाकारों की वेशभूषा तैयार होती थी। संसाधनों की ऐसी तंगी थी कि युद्ध के दृश्यों के लिए आवश्यक धनुष-बाण बाजार से नहीं खरीदे जाते थे।
कमेटी सदस्य और संचालक खुद विशेष किस्म की लकड़ी की तलाश में जंगलों या बाजारों की खाक छानते थे, जिससे मजबूत धनुष और बाण गढ़े जा सकें। भगवान श्रीराम और अन्य स्वरूपों के मुकुट इत्यादि भी बाजार में नहीं मिलते थे। इन्हें लेने दिल्ली जैसे बड़े शहरों में जाना पड़ता था। इसलिए पुराने गत्तों को काटकर उन्हें विशेष जिल्द के कवर से मढ़कर मुकुट तैयार किए जाते थे। संवाद
इस तकनीकी दौर में हर कलाकार के पास कॉलर माइक होता है, जिससे फुसफुसाहट भी मंच के कोने-कोने तक गूंज जाती है। 75 साल पहले तकनीकी संसाधन के नाम पर केवल एक ही माइक हुआ करता था, जिसे मुख्य किरदार के सामने रख दिया जाता था। ऐसे में जो कलाकार क्षणिक या छोटे किरदार निभाते थे, उन्हें अपने संवाद इस कदर ऊंची आवाज और पूरी ऊर्जा के साथ बोलने पड़ते थे, ताकि पंडाल में बैठे आखिरी व्यक्ति तक हर शब्द साफ पहुंच सकें।
विज्ञापन

पीढ़ियों का अटूट रिश्ता और कायम रौनक
कमेटी के प्रधान अजय गोयल का कहना है कि बदलते वक्त के साथ तकनीक बदली, पहनावा बदला और तौर-तरीके भी बदले, लेकिन रामलीला के प्रति लोगों की दीवानगी और आस्था में रत्तीभर भी कमी नहीं आई है। आज यहां तीन-तीन पीढ़ियां इस परंपरा को संभालती आ रही हैं। दादा से शुरू हुआ यह सिलसिला पोतों तक पहुंच चुका है, जो इस बात का प्रमाण है कि भले ही मंच के साधन बदल गए हों, लेकिन पूर्वजों की छोड़ी हुई इस सांस्कृतिक विरासत की रौनक आज भी उतनी ही जीवंत है।

रामलीला मंचन के दौरान भगवान श्रीराम की आरती करते अतिथि। कमेटी- फोटो : 1

विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें