संवाद न्यूज एजेंसी
जगाधरी। हनुमान गेट स्थित दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान आश्रम में साप्ताहिक सत्संग एवं भजन संकीर्तन में साध्वी सुयशा भारती ने कहा कि मनुष्य का प्रत्येक पुरुषार्थ केवल मन की प्रसन्नता एवं संतुष्टि के लिए होता है चाहे वह क्षण भर के लिए ही क्यों न हो।आज मानवीय जीवन की विडंबना एवं दुर्दशा का सबसे बड़ा कारण केवल यही है।
उन्होंने कहा कि हम एकांत में बैठकर विचार करें तो शायद अपने जीवन में दुख के कारण और सुख के स्रोत को ढूंढ पाएंगे। उसके लिए सर्वप्रथम मन को दिशा दिखाने वाले एक ब्रह्मनिष्ठ संत की आवश्यकता है। वे ब्रह्मज्ञान के द्वारा हमारे मन को पूरी तरह परिवर्तित करने में सक्षम है। वे मन को उसका वास्तविक स्वरूप दिखाकर उसे पुनः ब्रह्म में स्थापित करके सदा के लिए आनंदमय बनाते हैं।
भारती ने कहा कि भगवान को चढ़ाए जाने वाला पुष्प हमारे मन का प्रतीक है लेकिन इस पुष्प को यदि समय रहते ईश्वरीय चरणों में ना अर्पित किया जाए तो टूट कर बिखरना इसकी नियति है।मन उस अबोध बालक की तरह है जो हित अहित का विचार किए बिना ही व्यक्ति, वस्तु या स्थान की ओर आकर्षित हो जाता है और उसे पाने के लिए हठ करता है। यदि इसकी हठ पूरी न हो तो यह व्यक्ति को चिंता, तनाव, निराशा या आत्महत्या तक भी पहुंचा देता है।
ऐसा मन अस्वस्थ है और इसका केवल एक ही कारण है कि हमारा मन स्वस्थ एवं सकारात्मक विचारों रूपी भोजन से वंचित रहता है। मन ब्रह्म स्वरूप है और जब तक यह पुनः ब्रह्म में प्रतिष्ठित नहीं होता तब तक यह अशांत और विचलित ही रहता है क्योंकि इस नश्वर संसार से हमारे मन को कदापि शाश्वत सुख की प्राप्ति नहीं हो सकती। हमारा मन सदा के लिए तभी आनंदित हो सकता है जब वह अपने प्रकाश स्वरूप ब्रह्म से जुड़कर ब्रह्ममय हो जाता है फिर वह संसार के किसी भी आकर्षण या प्रलोभन में नहीं भटकता है।