जगाधरी। हनुमान गेट स्थित दिव्य ज्योति जागृति संस्थान आश्रम में साप्ताहिक सत्संग हुआ। आशुतोष महाराज के शिष्य स्वामी ज्ञानानंद ने श्रद्धालुओं को मानव जीवन के उत्थान के लिए कई बहुमूल्य सूत्रों के बारे में बताया।
उन्होंने सेवा का महत्व समझाते हुए कहा कि केवल मनुष्य का शरीर लेकर पैदा हो जाना ही मनुष्यता की पहचान नहीं है। वास्तविक मनुष्य तभी कहलाते हैं जब हमारे भीतर मनुष्यत्व के गुण उजागर होते हैं। सृष्टि में उत्पन्न कोई भी जीव जंतु अपनी प्रकृति और स्वभाव से बंधे हुए हैं और प्रकृति द्वारा निर्धारित कार्यों में ही संलग्न रहते हैं।
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उन्होंने बताया कि मानव को सृष्टि का सिरमौर कहा गया है चूंकि वह अपने लिए आत्मिक उत्थान के द्वार खोल सकता है। चुनाव करने का एक मात्र विकल्प मनुष्य के पास है, परंतु हम अपनी संकीर्ण सोच और मिथ्या अहंकार के वशीभूत होकर मनुष्यत्व को भूला कर स्वयं को पशु की श्रेणी से भी नीचे गिराकर अपना पतन कर लेते हैं।
उन्होंने बताया कि आशुतोष महाराज कहते हैं कि विलुप्त मानवता को केवल ब्रह्मज्ञान के द्वारा ही पुनर्जीवित किया जा सकता है। ब्रह्मज्ञान हमारे दृष्टिकोण को पूर्ण रूप से परिवर्तित कर देता है और हम अपनी सोच के संकीर्ण दायरे से बाहर निकलकर परोपकार एवं जन कल्याण के बारे में सोचने लगते हैं। तभी हम मानवता के उत्थान हेतु सेवा में अपने जीवन को लगाते हैं।