सुभाष कांबोज ने बताया कि वह पूरे भारत में खुद शहद की बिक्री करते हैं। उनका शहद तमिलनाडु, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल आदि में बिकता है। वहीं दूसरी ओर सरसों के फूलों का शहद अमेरिका समेत कई अन्य देशों में जाता है। सरसों के फूलों से मधुमक्खियों द्वारा तैयार किए गए शहद की बाहर के देशों में ज्यादा मांग है।
उनका शहर के कारोबार में 35 से 40 लाख रुपये का टर्न ओवर है। जिसमें से लगभग 15 लाख रुपये की सालाना शुद्ध आमदनी होती है। उन्होंने बताया कि अब तक वह हजार से ज्यादा लोगों को मधुमक्खी पालन का प्रशिक्षण देकर आत्म निर्भर बना चुके हैं। उन्होंने अपने खेतों में पारंपरिक फसलों के अलावा एक बाग भी लगाया हुआ है जहां पर मधुमक्खियों के बॉक्स रखे जाते हैं।
उन्होंने बताया कि मधुमक्खी पालन से शहद के अतिरिक्त 6 उत्पाद- मोम, कोम्ब हनी, बी प्रोपोलिश, बी पोलन, वीवनम व रायल जैली भी तैयार करते हैं।
आईबीडीसी कुरुक्षेत्र में उनको मुख्यमंत्री मनोहर लाल, हरियाणा के पूर्व राज्यपाल कप्तान सिंह सोलंकी, उदयपुर विश्वविद्यालय व यमुनानगर के उपायुक्त रोहतास खर्ब द्वारा मधुमक्खी पालन के क्षेत्र में सम्मानित किया गया है।
प्रगतिशील मधुमक्खी पालक किसान सुभाष कांबोज ने युवाओं एवं किसानों के लिए अपने संदेश में कहा है कि वे किसी भी व्यवसाय को मेहनत व लगन से करें। सफलता जरूर मिलेगी। उन्होंने बताया कि किसान पारंपरिक खेती को नुकसान का धंधा समझने लगे हैं। इसलिए वे खेती के साथ-साथ मधुमक्खी पालन, बागवानी, पशु डेयरी, दलहन व तिलहन की खेती से जोड़कर अच्छी आय अर्जित कर सकते हैं। उन्होंने बताया कि पारंपरिक खेती में किसान के पास वर्ष में केवल 2 या 3 महीने का ही कार्य होता है।
शेष समय खेती से जुड़े अन्य व्यवसायों को आधुनिक मांग के अनुसार वैज्ञानिक दृष्टि से इन कार्यों को अपनाने से किसानों के लिए आय बढ़ने की अपार संभावनाएं हैं। उन्होंने कहा कि यमुनानगर के जिला उद्यान अधिकारी डॉ. रमेश पाल सैनी, आईबीडीसी कुरुक्षेत्र के डॉ. बिल्लू यादव व कृषि विज्ञान केन्द्र दामला के डॉ. नरेन्द्र गोयल ने उनके मधुमक्खी पालन व्यवसाय को बढ़ावा देने में अपना विशेष योगदान दिया है।