संवाद न्यूज एजेंसी
जगाधरी। राजकीय विद्यालय में विद्यार्थियों को मिड-डे-मील में परोसी जा रही तैयार (इंस्टेंट) खीर पर सवाल उठने लगे हैं। खीर जो मिनटों में तैयार होनी चाहिए, उसे बनाने में दो गुना ईंधन और समय लग रहा है। इससे सस्ती बताई जाने वाली खीर सामान्य से भी ज्यादा पड़ रही है। पैकेट में बंद और सीधे उपयोग में लाने के कारण खीर की गुणवत्ता पर अभिभावक चिंतित हैं।
राजकीय विद्यालयों में खीर तैयार करने की प्रक्रिया और उपयोग में लाई जा रही सामग्री ने शिक्षकों के साथ अभिभावकों को बच्चों के स्वास्थ्य के प्रति गंभीर कर दिया है। शिक्षकों के अनुसार पैकेट से सीधे खीर तैयार की जाती है। इस पैकेट में चावल, चीनी, दूध सभी पदार्थ पहले से ही मिश्रित हैं। इसकी प्रक्रिया के अनुसार पैकेट खोलकर सामग्री सीधे गर्म पानी में डाली जाती है और खीर तुरंत तैयार हो जाती है। विभाग की ओर से सभी विद्यालयों में 45-45 ग्राम के खीर के पैकेट दिए गए हैं। तय दिन पर मिड-डे मील वर्कर इन पैकेट सीधे दूध में डालकर खीर तैयार करती हैं।
मिड-डे-मील वर्कर्स यूनियन प्रधान शरबती देनी ने बताया कि पैकेट की सामग्री साफ करना संभव नहीं है, यदि इसे पानी में धोया तो चावल, चीनी व दूध बह जाएंगे, इसलिए इसे सीधा गर्म पानी में डाला जाता है। चावल में चीनी पहले से मिली होती है, इसलिए चावल पकते नहीं हैं। मीठा मिश्रित चावल पकने में दोगुना समय लगता है।
यदि पैकेट के मानक के अनुसार खीर बनाई जाए तो चावल कच्चे रह जाते हैं। पूरी तरह चावल पके न होने के कारण यह खाए नहीं जाते हैं। यह खीर बच्चों को खिलाई जाए तो उनके पेट में दर्द, अपच सहित कई तरह की गंभीर बीमारियां लग सकती हैं। ऐसे में यह खीर पकानी पड़ती है। मीठा पहले से होने के कारण चावल पकने में ज्यादा समय लेते हैं।
इससे ईंधन की लागत बढ़ गई है और बढ़े ईंधन की गिनती नहीं की जाती है, जो मील वर्कर्स पर पड़ती है। वहीं, इससे काम भी ज्यादा हो गया है। इस खीर में ईंधन, धन, समय के दौरान दोहरा श्रम लग रहा है। सरकार को यह खीर के पैकेट बंद कर देने चाहिए। बच्चों को स्कूल में परांपरिक पद्धति से बनी खीर व व्यंजन ही बनाकर परोसने की योजना लागू की जाए।
मिड-डे मील निदेशालय के नियमों के अनुसार ही तैयार किया जा रहा है। विद्यालयों में उपलब्ध कराई गई सामग्री तय मानकों के अनुरूप है और इसकी सप्लाई सीधे तौर पर की जा रही है। गुणवत्ता की कोई शिकायत मिलने पर जांच कर कराई जाएगी। - अशोक राणा, जिला मौलिक शिक्षा अधिकारी।