संवाद न्यूज एजेंसी
जगाधरी वर्कशॉप। श्री राधा कृष्ण सखा मंडल की ओर से आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के तीसरे दिन कथा व्यास रविनंदन शास्त्री ने कहा कि दुष्ट का संग कभी नहीं करना चाहिए। दुष्ट का संग चाहे स्वप्न में ही क्यों न मिले, मानसिकता प्रभावित हो जाती है।
उन्होंने कहा कि पापी दर्शन नहीं करना चाहिए। पापी के हाथ का खाना पीना भी नहीं चाहिए। जिसका खान पान शुद्ध नहीं है जिसकी सोच अच्छी नहीं है जिसकी कमाई गंदी है। ऐसे लोगों से संबंध रखने में हमेशा बचना चाहिए। इससे पहले की यमराज घसीटने आए अपनी गलतियों को सुधारने के लिए महापुरुषों के चरणों में बैठ जाना चाहिए।
उन्होंने बताया कि परीक्षित ने एक पल नहीं गंवाया गंगा जी के तट पर आ गए। संत महात्मा इकट्ठे हुए सभी से कहा कि मेरे पास सात दिन हैं कोई उपाय है मुझे बचाने का। पाप भी करके आया हूं, श्राप भी करके आया हूं। उपाय सभी संतों ने बता दिए मगर गारंटी किसी ने नहीं दी। परीक्षित बैठे रह गए संत भले ही मुक्ति की गारंटी नहीं दे पास मगर उन्होंने भगवान से प्रार्थना की हे प्रभु कलयुग ने परीक्षित को फंसाया है यह ऐसा नहीं था।
परीक्षित के लिए स्वयं श्री शुकदेव जी के रूप में भगवान प्रकट हुए। शुकदेव जी को देखकर सभी संतों के चेहरे खिल गए। परीक्षित ने प्रणाम करने से पहले अपना पाप स्वीकार किया अपनी गलती स्वीकार की। परीक्षित ने भगवान से कहा कि मैं यहां सन्यास लेकर नहीं आया मैं शापित होकर यहां आया हूं क्या आप मुझे स्वीकार करोगे मुझ पापी का हाथ पकड़ोंगे। परीक्षित ने अपनी एक भी खूबी भगवान को नहीं बताई। सारा जीवन जिसने संतों की सेवा में लगाया।