जगाधरी (यमुनानगर)। विशाल नगर के मोहम्मद नईम के आंगन में दस वर्ष पहले तक करीब 250 गौरैया चहकती थीं, पर बीते तीन वर्षों से नईम खुद गौरैया की चहचहाहट सुनने को तरस गए हैं।
इसके बावजूद उन्हें गायक स्वानंद किरकिरे के गीत...ओ री चिरैया, नन्ही सी चिड़िया...अंगना में फिर आ जा रे पर पूरा भरोसा है। वह कहते हैं कि गौरैया लौटेंगी। वह आज भी इसी उम्मीद पर प्रतिदिन छत पर तीन समय का दाना-पानी रख रहे हैं।
विलुप्त होती गौरैया को बचाने और अपने यहां वापस लाने के लिए नईम न सिर्फ घर के आंगन व छत पर बल्कि आबादी से दूर विजय कॉलोनी में प्लॉट खरीद गौरैया की पसंद की घनी व कंटीली बोगनवेलिया बेलों की देखरेख कर रहे हैं। वह हर शख्स को घरों में घनी-कंटीली बेले लगाने सहित छत पर दाना-पानी डालने का भी आह्वान कर रहे हैं। नईम की मानें तो गौरैया की चहकने की आवाज पहले जैसे हर घर के आंगन में सुनाई देगी, जिसके लिए सिर्फ सामूहिक प्रयास की जरूरत है।
गौरैया के प्रति 33 वर्षों से लगाव : मोहम्मद नईम बताते हैं कि वर्ष-1992 में 30 वर्ष के थे तभी गौरैया के प्रति उनका लगाव बढ़ा। तब से रोज आंगन व छत पर गौरैया के लिए दाना-पानी रखने लगे। इससे गौरैया आने लगी और कुछ समय में गौरैया ने घर के साथ ही उनके बंद पड़े पुराने कच्चे मकान में घोंसले बना लिए। ये देख गौरैया के लिए घर के चारों ओर बोगनवेलिया की बेल लगाई, जो काफी घनी व कंटीली होती हैं।
इसमें गौरैया शिकारी पक्षियों से महफूज रहती हैं। इसके दो साल में ही 15-20 गौरैया यहां रहने लगी। अगले दो-तीन वर्षों में गौरैया की संख्या 250 तक पहुंच गई।
आंगन व छत पर लगी बेल में गौरैया दिन-भर चहचहाती थीं। नईम ने बताया कि गौरैया को रोज बाजरा व रोटी खिलाते थे। जब वह घर में नहीं होते तो परिवार के अन्य सदस्य यह जिम्मेदारी उठाते थे। संवाद