संवाद न्यूज एजेंसी
यमुनानगर। मॉडल टाउन में एसएस जैन सभा में जैन साधु-साध्वियों के सानिध्य में धर्मसभा का आयोजन किया गया। इस दौरान साध्वी जान्वी महाराज ने कहा कि मनुष्य स्वयं अपना सबसे बड़ा मित्र भी है और शत्रु भी। यदि हमारी प्रवृत्ति और व्यवहार सही दिशा में हैं तो हम स्वयं के मित्र बन जाते हैं, लेकिन गलत प्रवृत्ति अपनाने पर व्यक्ति खुद ही अपना शत्रु बन जाता है। उन्होंने आत्मावलोकन और आत्मसंयम पर विशेष जोर दिया।
साध्वी हर्षिता महाराज ने जैन दर्शन के अनुसार चार दुर्लभ उपलब्धियों का उल्लेख करते हुए कहा कि संसार में मनुष्य जन्म मिलना, धर्म का श्रवण होना, धर्म पर श्रद्धा बनना और फिर उस पर आचरण करना अत्यंत दुर्लभ है। इन चारों का संगम ही मोक्ष के मार्ग को प्रशस्त करता है। उन्होंने कहा कि केवल धर्म सुनना पर्याप्त नहीं, बल्कि उसे जीवन में उतारना ही सच्चा पुरुषार्थ है।
तेजस मुनि जी ने मार्मिक शब्दों में कहा कि मनुष्य तन पाना कोई बड़ी बात नहीं है, यह तो कसाई को भी मिला है, लेकिन मनुष्य तन पाकर उसमें मनुष्यता का वास होना ही सबसे बड़ी उपलब्धि है। उन्होंने कहा कि करुणा, अहिंसा और संवेदनशीलता के बिना मनुष्य जीवन निरर्थक है।
गुरुदेव रचित मुनि महाराज ने कर्म सिद्धांत को सरल शब्दों में समझाते हुए कहा कि आज का जीव कर्म बांधता अधिक है और निर्जरा कम करता है। भगवान और साधारण मनुष्य के बीच अंतर बताते हुए उन्होंने कहा कि भगवान पुराने कर्मों की निर्जरा कर नए कर्मों का बंधन रोक देते हैं, जबकि सामान्य मनुष्य नए कर्मों का बोझ बढ़ाता चला जाता है। कर्मों से पूर्ण मुक्त होकर ही जीव परम अवस्था को प्राप्त करता है।