यमुनानगर। शहर के मॉडल टाउन में रहने वाले कारगिल युद्ध के शहीद हवलदार नवीन कुमार मेहता के परिवार को शहरवासी तक नहीं जानते हैं। वर्ष 1999 में शहीद हुए नवीन कुमार के बच्चे जवान हो गए हैं। वहीं प्रशासन व सरकार की ओर से उनकी सुध लेने की वीरांगनाओं की आस भी दम तोड़ चुकी है। कारगिल युद्ध में 22 साल पहले बलिदान देने वाले हवलदार नवीन कुमार मेहता की पत्नी डोली मेहता का दुख आंसू बनकर सामने आया। इस दौरान उनके चेहरे पर प्रशासन और सरकार के प्रति रोष और निराशा दिखाई दी।
डोली मेहता ने बताया कि उन्हें पति की शहादत का हमेशा गर्व रहेगा। सर्वोच्च बलिदान देने वाले सैनिक का परिवार किस हाल में हैं, इसकी प्रशासन व सरकार ने कभी सुध नहीं ली। प्रशासन की ओर से 15 अगस्त व 26 जनवरी को उन्हें याद किया जाता है। सम्मान के नाम पर उन्हें एक शॉल थमा दी जाती है। इतने वर्षों में कभी जिले में शहीद पति के लिए कोई कार्यक्रम व सभा तक नहीं हुई। प्रशासन भले ही उन्हें कार्यक्रम में न बुलाए कम से कम प्राण न्यौछावर करने वाले शहीदों को श्रद्धांजलि तो दे।
डोली मेहता ने बताया कि जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय के साथ स्थित राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक स्कूल का नाम शहीद नवीन कुमार मेहता रखा गया है। सम्मान के नाम पर स्कूल में एक प्रतिमा और बाहर एक बोर्ड है। उनके नाम के स्कूल में कोई सभा तक नहीं हुई। स्कूल के विद्यार्थियों को उनके पति नवीन कुमार मेहता की शहादत के बारे पता तक नहीं है। संवाद
शहीद पिता को याद भी याद करता है बेटा
मॉडल टाउन में 22 जुलाई 1964 में पैदा हुए नवीन कुमार ने फौजी पिता अमरनाथ मेहता से प्रेरित होकर देश सेवा की राह चुनी। मुकंद लाल स्कूल से दसवीं तक पढ़ाई कर मात्र 18 वर्ष की आयु में वे 1982 में वे सेना में हवलदार के पद पर भर्ती हुए। वर्ष 1999 में कारगिल युद्ध में भाग लिया। 22 जुलाई 1999 को दुश्मनों से लोहा लेते हुए देश के लिए बलिदान दिया। डोली मेहता ने बताया कि पति की मृत्यु के समय बेटी चीना छह वर्ष और बेटा राघव तीन वर्ष का था। बेटे को अपने पिता का चेहरा तक याद नहीं है। बेटे के लिए पिता मात्र एक शब्द है। पिता का प्यार, दुलार उसे पता तक नहीं है। वे साल में दो महीने के लिए घर आते थे। कई दिन तक बेटा राघव उनके पास नहीं जाता चूंकि उन्हें अंजान समझता था। जब तक उसे पापा शब्द बोला आया, तब तक उस शब्द का वजूद नहीं बचा था। आज बेटा अपने दोस्तों व अन्यों को पिता के साथ देखता तो मायूस हो जाता है। फोटो एलबम देखकर रोता है। वहीं डोली मेहता भी पति की याद में आंसू बहाती है और फोटो देखकर पति से अकेले में बात करती हैं।
खाए धक्के, नहीं मिली गैस एजेंसी
डोली मेहता ने बताया कि पति की शहादत पर सरकार ने दस लाख रुपये की आर्थिक सहायता दी। इस धनराशि उन्होंने अपना घर बनाया और बच्चों को पढ़ाया। इसके बाद बेटी शादी कर दी। इसके बाद सरकार व प्रशासन ने उनकी कभी सुध नहीं ली। उन्होंने गैस एजेंसी व पेट्रोल पंप के लिए दर्जनों बार सरकार को अर्जी दी। हर बार मांग खारिज कर दी जाती। बेटा पढ़ लिखकर बेरोजगार था तो पिछले साल जनवरी में अपना कारोबार शुरू किया। कारोबार लॉकडाउन के कारण बंद हो गया। बेटा बेरोजगार है और निजी कंपनियों में नौकरी के लिए अर्जी भेजता रहता है।