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Yamuna Nagar News: सरकारी जमीन पर कब्जे होने से आईडीटीआर की योजना अटकी

Fri, 24 Apr 2026 12:30 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, यमुना नगर
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औरंगाबाद में आईडीटीआर के लिए खरीदी गई जगह। आर्काइव
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संवाद न्यूज एजेंसी
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यमुनानगर। औरंगाबाद में ड्राइविंग प्रशिक्षण एवं अनुसंधान संस्थान (आईडीटीआर) के लिए खरीदी गई करोड़ों रुपये की सरकारी जमीन पर अवैध कब्जे हटाने में सरकारी तंत्र की नाकामी ने सवाल खड़े कर दिए हैं। करीब पांच करोड़ रुपये खर्च कर नगर निगम से खरीदी गई साढ़े नौ एकड़ जमीन वर्षों बाद भी कब्जा मुक्त नहीं हो सकी है।
स्थिति यह है कि एक के बाद एक अधिकारी बदलते रहे, लेकिन समस्या जस की तस बनी हुई है। परिवहन विभाग ने इस जमीन पर आईडीटीआर भवन बनाने की योजना तैयार की थी, जिस पर 35 से 40 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है। यह परियोजना जिले के लिए बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही थी, लेकिन सरकारी विभागों के बीच समन्वय की कमी और लापरवाही के चलते यह योजना कागजों से आगे नहीं बढ़ पाई है।
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जमीन की निशानदेही कराना ही प्रशासन के लिए बड़ी चुनौती बन गया है। पहले जब निशानदेही कराई गई तो कब्जाधारियों ने पिलर तक उखाड़ दिए। बाद में जमीन कम निकलने पर परिवहन विभाग ने चार कनाल 16 मरले अतिरिक्त भूमि के लिए 28 लाख रुपये और जमा कराए। दोबारा निशानदेही की प्रक्रिया भी अधर में लटकी है। तहसील स्तर पर कार्रवाई के लिए पत्राचार किया गया, परंतु अब तक कोई ठोस पहल नहीं हुई।
चौंकाने वाली बात यह है कि जमीन की चहारदीवारी के लिए करीब 70 लाख रुपये नगर निगम को दिए जा चुके हैं, फिर भी काम शुरू नहीं हो पाया। इससे साफ है कि विभागों के बीच जिम्मेदारी तय करने का अभाव है। हर विभाग अपनी जिम्मेदारी से बचता नजर आ रहा है, जिसका खामियाजा परियोजना को भुगतना पड़ रहा है। बिजली निगम का रवैया भी कम सवालों के घेरे में नहीं है।
जमीन में लगे बिजली के पोल और तार हटाने के लिए पहले 10 लाख 300 रुपये का अनुमान तैयार किया गया था। तत्कालीन उपायुक्त ने इस पर नाराजगी जताते हुए इसे संशोधित करने के निर्देश दिए। क्योंकि 10 लाख रुपये तक के एस्टीमेट को मंजूरी एससी स्तर पर ही मिल जाती है।
मात्र 300 रुपये अधिक होने की वजह से इसे मुख्यालय भेज दिया गया था। तब डीसी ने कहा था कि 300 रुपये मुझ से ले लेते। हालांकि इसके बाद करीब 7.40 लाख रुपये का नया एस्टीमेट तैयार किया गया। इसके बावजूद आज तक बजट स्वीकृत नहीं हुआ और काम शुरू नहीं हो सका।
एडवोकेट वरयाम सिंह का कहना है कि पूरे मामले में प्रशासनिक इच्छाशक्ति की कमी साफ दिखाई देती है। यदि सरकारी जमीन पर ही कब्जा हटाने में विभाग असफल रहते हैं, तो आम लोगों की समस्याओं के समाधान की उम्मीद कैसे की जा सकती है। यह मामला केवल एक जमीन का नहीं, बल्कि सरकारी कार्यप्रणाली की सुस्ती और जवाबदेही की कमी को उजागर करता है।
ड्राइविंग प्रशिक्षण केंद्र बनने से मिलती बड़ी राहत

आईडीटीआर केंद्र बनने से जिले के युवाओं को भारी वाहन चलाने का प्रशिक्षण स्थानीय स्तर पर मिल सकता था। वर्तमान में हैवी ड्राइविंग लाइसेंस के लिए लोगों को करनाल या कैथल जाना पड़ता है, जिससे समय और पैसे दोनों की बर्बादी होती है। प्रस्तावित केंद्र में आधुनिक ऑटोमेटिक ड्राइविंग टेस्ट ट्रैक, कंप्यूटरीकृत क्लासरूम, वर्कशॉप और उन्नत प्रशिक्षण सुविधाएं विकसित की जानी हैं। यहां ट्रक, बस, क्रेन, जेसीबी और अन्य भारी मशीनों के संचालन का प्रशिक्षण दिया जाना था, जिससे कुशल चालकों की संख्या बढ़ती और सड़क हादसों में भी कमी आती।
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आईडीटीआर की जमीन की निशानदेही करवा कर कब्जे हटाने के लिए संबंधित विभाग को पत्र लिखा है। हाल ही में रिमांइडर भी भेजा गया है। जमीन पर कब्जा मिलने के बाद ही आईडीटीआर के भवन का निर्माण संभव हो सकेगा। - हैरतजीत कौर, डीटीओ यमुनानगर।
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